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शुक्रवार, अगस्त 09, 2019

chandraswami the con of india


चंद्रास्वामी- जब एक तांत्रिक ने देश को मूर्ख बना डाला

chandraswami the con of india

21 सितंबर 1995 की दोपहर जब हमारी स्कूल के छुट्टी हुई ओर स्कूल बस द्वारा घर जा रहे थे तो बीच मे देखा की बिना कोई वार त्योहार आज मंदिरो मे लंबी लंबी कतारें लगी है ओर विशेषकर उन मंदिरो मे लगी है जहां श्री गणेश की मूर्ति स्थापित थी दरअसल देश मे एक खबर फैली थी की श्री गणेश जी स्वयं दूध पी रहे है ओर मंदिरो मे जो कतार लगी है वे सब गणेश जी को दूध पिलाने की चाह मे खड़े है घर गए टीवी चालू किया तो पाया की ये सिर्फ यहाँ की एक शहर मात्र की कहानी नही बल्कि पूरे देश की जनता गणेश जी को दूध पिलाने मे व्यस्त है ओर जहां कही गणेश जी की प्रतिमा नही मिल रही शिव जी को ही दूध पीला कर खुश है आज भी जब जब गणेश चतुर्थी करीब आती है सर्वप्रथम 1995 वाला किस्सा जरूर याद आता है

 दरअसल भारत के सबसे बड़े तांत्रिक और राजनैतिक रुतबा रखने वाले चंद्रास्वामी ने सुबह मीडिया से कहा था की “कल रात उन्हे सपने मे गणेश जी आए ओर कहा की वे दुध पीना चाहते है”
 ओर फिर क्या था??? उस दौर के विपक्ष के सबसे बड़े नेता ओर पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत श्री अटल जी भी दिल्ली मे एक मंदिर मे गणेश जी को दूध पिलाने पहुँच गए थे जैसे जैसे खबर फैली देश मे गणेश मंदिरो के आगे जबर्दस्त भीड़ जमा होनी शुरू हो गयी  हालांकि बाद मे खुलासा भी हुआ की सुप्रीम कोर्ट मे चंद्रास्वामी के एक केस मे फेसला आना था सो देश और मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए ये एक चाल मात्र थी

आखिर कितने बड़े तांत्रिक थे चंद्रास्वामी:- यकीनन जिसकी बात देश के सबसे बड़े विपक्ष के नेता ने मान ली हो तो निच्छित ही वो वास्तव मे कोई बड़ा ही तांत्रिक ही होगा???
का भविष्य तक बता देते थे राजीव गांधी की ह्त्या से ठीक 2 महीने पहले उनकी वो भविष्यवाणी जिसमे उन्होने कहा था की अब राजीव गांधी कम ही दिनों के मेहमान है अब मेरे मित्र नरसिहराव ही प्रधानमंत्री बनेंगे
और दुर्भाग्य से राजीव गांधी की ह्त्या के बाद स्वामी पर राजीव गांधी की ह्त्या तक का आरोप लग गया था लेकिन उनकी पीवी नरसिम्हाराव के पीएम बनने की भविष्यवाणी भी सच साबित हुई ओर अपने परम मित्र नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्री बनते ही चंद्रास्वामी भी समझ गए थे की उन्हे अब सुरक्षा कवच मिल गया है दरअसल सिर्फ नरसिम्हाराव ही नही पूर्व पीएम चंद्रशेखर से लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर, ब्रुनेई के सुल्तान, हॉलीवुड अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर, बहरीन के शेख इसा बिन सलमान अल खलीफा, सऊदी अरब के हथियारों के सौदागर अदनान खशोगी, टाइनी रॉलैंड, इराक के नेता सद्दाम हुसैन, मशहूर डिपार्टमेंटल स्टोर हैरोड्स के मालिक अल फैयद भाई और माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम जैसे लोग  तक स्वामी के कायल थे पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी किताब मे जिक्र किया है की लंदन यात्रा के दौरान चंद्रास्वामी उनके साथ थे ओर इंगलेंड सीनेट की एक बैठक मे स्वामी ने मारग्रेट का हाथ देखते हुए भविष्यवाणी की थी कि तुम जल्द ही इंगलेंड कि प्रधानमंत्री बनने जा रही हो ओर जब मारग्रेट प्रधानमंत्री बनते ही स्वामी को मिलने विशेष आमंत्रण भेजा था और उसके बाद भी स्वामी से लगातार संपर्क मे रही दरअसल 70 और 80 दशक मे छुटभैये नेता अपनी सांसदी कि टिकट से लेकर इंद्रा जी से मिलने तक कि भविष्यवाणी जानने स्वामी के पास आते थे ये वो दौर था जब स्वामी देश मे नामचीन होते जा रहे थे और उनका राजनीतिक कद जिस गति से बढ़ रहा था उनके भ्रष्ठाचार के कारनामे भी इसी गति से बढ़ रहे थे 90 का दौर आते आते स्वामी का राजनीतिक रुतबा इतना बढ़ गया था जितना कभी इंद्रा जी के खास गुरु आचार्य धीरेंद्र का हुआ करता था लेकिन धीरेंद्र किसी का भविष्य नही बताते थे न ही तांत्रिक थे इसलिए आम नेताओ कि भीड़ च्ंद्रास्वामी  के इर्दगिर्द ज्यादा देखी गयी किसी भी राजनीतिक पहुँच वाले स्वामी के मुक़ाबले लेकिन कहते है न जो पाप किए है उनका प्रायचित भी इसी जन्म मे करना पड़ता है उसके लिए कोई अलग से जन्म नही मिलता सो यही चंद्रास्वामी जो कभी बड़े बड़े गद्दी नविश नेताओ ओर सेलिब्रिटी से घिरे रहते थे उन्ही स्वामी ने अपना अंतिम समय ज़्यादातर सजा याफ़्ता होते हुए जैल मे निकाला ओर जब बाहर आए कोई उनका हाल चाल तक पूछने नही गया ओर अंतत मई 2017 मे उनके दिल्ली स्थित आश्रम मे ही उनकी मौत हो गयी दरअसल स्वामी पर राजीव गांधी कि ह्त्या से लेकर दुनिया के कुख्यात हथियार तस्कर  अदनान ख्गोशी से व्यापारिक रिश्ते तक के आरोप लगे इससे अलावा स्वामी पर राजीव गांधी के हत्यारे लिट्टे संघठन से संबंध के भी आरोप लगे  नरसिम्हा राव का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही चंद्रास्वामी की शोहरत का सितारा भी अस्त होने लगा था. उनके ऊपर तमाम आरोप लगे. जांच शुरू हो गई थी. वो गलत वजहों से ही सुर्खियों में रहते थे.
2004 में सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट से चंद्रास्वामी और राजिंदर जैन के रिश्तों की पड़ताल की इजाजत मांगी थी राजिंदर जैन का राजीव गांधी की हत्या से ताल्लुक बताया जाता था. 2014 में एक कारोबारी ने चंद्रास्वामी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई कि उनके आश्रम में उसके तीन करोड़ के जेवरात लूट लिए गए


साहूकार का बेटा बना तांत्रिक:-
 चंद्रास्वामी का जन्म 1948 में राजस्थान के अलवर में हुआ था. उनके पिता साहूकार थे, जिन्होंने बाद में हैदराबाद को अपने कारोबार का ठिकाना बना लिया था
9 भाई-बहनों में चंद्रास्वामी पांचवीं संतान थे उनका असल नाम नेमिचंद्र जैन था बहुत कम वक्त में चंद्रास्वामी ने खुद को एक भविष्यवक्ता, दिमाग पढ़ने की ताकत रखने वाले तांत्रिक यानी जगदाचार्य चंद्रास्वामी के तौर पर मशहूर कर लिया था जिस कारण वे अंतर्राष्ट्रीय पटल प्रसिद्ध हो गए

रविवार, अगस्त 04, 2019

swami vivekananda


स्वामी जी से जुड़ा दिलचस्प वाकया 



swami vivekananda




वैसे तो स्वामी जी से जुड़े कई दिलचस्प किस्से है जिन्हे पढ़ सुन कर आज भी महसूस होता है की महान व्यक्तित्व के धनी लोग सदियों मे अकाध ही जन्म लेते है एव बहुत कम अंतराल के लिए धरती पर जीवन यापन करते है क्योकि ऐसे महापुरुषो के लिए स्वत देवता भी भुजाए फैलाये रहते है स्वामी विवेकानंद जी भी उन ही महान व्यक्तियों मे से एक थे जिन्होने अखंड सनातन धर्म को विश्व पटल पर नए तरीके से प्रस्तुत करने का कार्य किया राजस्थान के खेतड़ी रियासत के महाराजा के सहयोग से स्वामी जी 1893 मे अमेरिका पहुंचे एवं वहाँ विश्व धर्म सभा मे भारत के तरफ से सनातन धर्म हेतु अपना पक्ष रखा उसके बाद जो हुआ वो सर्व विदित है

स्वामी जी का वो भाषण जिसकी शुरुवात उन्होने मेरे प्यारे अमेरिकी भाइयो ओर बहनो से की थी और उस के बाद लगातार 5 मिनिट तक स्वामी कुछ नही बोले क्योकि पूरा कॉरीडोर तालियो से गूंज रहा था देवियो ओर सज्जनों कहने वाले बाकी सभी धर्मगुरुयों से अलग वहाँ स्वामी जी ऐसे पहले वक्ता थे जिन्होने वहाँ बैठे लोगो को भाईयो ओर बहनो कहा जो सबके हृदय को छु गया

दिलचस्प घटना
शिकागो यात्रा के दौरान भी स्वामी जी अपने सनातन धर्म का पालन करते हुए भगवा वस्त्रो मे ही रहते थे जो अमेरिकी लोगो के लिए ये पहनावा अटपटा सा था इससे पहले अमेरिकियो ने इस तरह भगवा धारण किए किसी साधु को नही देखा था एक बार स्वामी जी शिकागो से ट्रेन का सफर कर रहे थे उनके सामने बैठी 2 महिलाए लगातार स्वामी जी की वेषभूषा को लेकर टिप्पणियाँ कर रही थी स्वामी जो अनपढ़ गंवार इत्यादि बोल रही थी लेकिन स्वामी उनको दरकिनार कर अपने सफर का आनंद लेने मे व्यस्त थे तभी उन मे से एक महिला ने स्वामी जी हाथ मे महंगी घड़ी देखी जो स्वामी जी को उनके किसी अमेरिकी मित्र ने भेंट मे दी थी महिलाए ये देख कर हैरान थी की ऐसी गंवार वेषभूषा वाले व्यक्ति के हाथ मे इतनी महंगी घड़ी कैसे????
अब महिलाओ ने भी स्वामी जी के स्वभाव के साथ खेलने का फेसला किया ओर स्वामी जी से कहा की अपने हाथो मे जो घड़ी है वो उतारिए वरना हम पुलिस बुलाएँगे  इस पर स्वामी जी ने कोई प्रतिक्रिया नही दी महिला ने दुबारा कहा तो स्वामी जी ने बहरे होने का नाटक किया ओर कान की तरफ हाथ करते हुए महिलाओ को इशारे मे समझाया की उन्हे कुछ सुनाई नही दे रहा है
महिलाओ ने दुबारा इशारों मे कहा की घड़ी उतारिए तो स्वामी ने हाथ से इशारा करते हुए कहा की लिख कर दीजिये जो कहना चाहते हो????
महिलाए समझ गयी की स्वामी जी बहरे है सुन नही सकते सो एक महिला ने कागज पर लिख कर दिया की अपनी घड़ी हमे दे दो वरना हम पुलिस बुलाएँगे

स्वामी जी ने कागज हाथ मे लिया पढ़ा और मुसकुराते हुए पहली बार बोले की अब बुलाईए पुलिस मुझे भी पुलिस से कुछ कहना है
सामने बैठी दोनों महिलाए हक्की बक्की थी वे जिन्हे ठगने चली थी समझ गयी थी की एक भारतीय ने उन्हे ही ठग लिया है अगले ही स्टेशन पर दोनों महिलाए उतर गयी स्वामी जी मन ही मन मुस्कुरा रहे थे

इसके अलावा एक और दिलचस्प वाकया हुआ जब स्वामी जी शिकागो मे अपना व्यक्तव्य दे कर मंच से नीचे उतर रहे थे तब एक अमेरिकी महिला स्वामी जी के पास आई ओर कहा की मुझे आपसे शादी करनी है ओर  हमारे जो बच्चा होगा वो आपके जैसा महान व्यक्तित्व वाला होगा  स्वामी जी की भोहे तन गयी तुरंत जवाब देते हुए स्वामी जी ने कहा की सनातन धर्म मे साधु शादी नही करते ओर मे एक साधु हूँ लेकिन आप मुझे अपना बेटा बना सकती है ताकि आपको भी महान व्यक्तित्व वाला बेटा मिल जाएगा जवाब सुन कर महिला हैरान थी बाद मे महिला ने स्वामी की शिष्या बनने का निर्णय लिया ओर उनके साथ भारत आई जिंनका नाम निवेदिता था

शुक्रवार, अगस्त 02, 2019

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आखिर क्या कारण है की इंटरनेट की दुनिया मे गूगल सर्च  अपना कब्जा जमाये हुए है ओर हाल फिलहाल गूगल को टक्कर देने वाला कोई आस पास भी नही है????

बात 21 की सदी के उभरते समय की है जब भारत मे इंटरनेट नया नया प्रवेश किया था और हम स्टूडेंट होने के नाते अपने जिज्ञासु दिमाग को लेकर नेट केफे पहुँच जाया करते थे जहां प्रति घंटे 20 से लेकर 50 रु तक का चार्ज लिया जाता था ये बात सन 2000 की है जब 20रु मे आप बस मे बैठ कर 80 से 100 किलोमीटर का सफर कर सकते थे अर्थात 20 रु की बहुत अहमियत थी आज के दौर के 100रु प्रति घंटे जितनी 
शुरुवात मे याहू सब पर भारी था ओर उस दौर मे लगभग हम सबने अपनी पहली ईमेल आईडी याहू के मार्फत ही बनाई थी याहू मे मेसेंजर वाला भी ऑप्शन था जहां आप नए दोस्त बना कर चेट कर सकते थे ये शायद बाहर की दुनिया के लोगो को इंटरनेट के जरिए एक दूसरे से जोड़ने वाला दुनिया मे पहला सिस्टम था फेसबुक और  वाट्सप्प का तब जन्म भी नही हुआ था याहू के बाद कुछ सालो तक ऑर्कुट ने भी नेट की दुनिया मे अपना कब्जा जमाया क्योकि ऑर्कुट के पास याहू से बेहतर ऑप्शन थे सो लोग ऑर्कुट की तरफ खींचे चले आ रहे थे लेकिन सर्च इंजन मे याहू फिर भी प्रथम था  

इन सब से दूर लेरी पेज ओर सेरगे ब्रिन नामक दो छात्रो ने 1996 मे ही एक सर्च इंजन बना लिया था जिसका नाम था GOOGLE दरअसल गूगल शब्द गुगोल से बना था जिसका मतलब था एक के बाद सो शून्य
Google शुरूआती दिनों में पॉपुलर नहीं हुआ। इन दोनों को लग रहा था कि Google की वजह से इनकी पढ़ाई भी नहीं हो पा रही है। इसी कारण इन्होंने Google को बेचने का मन बनाया। इस फार्मूले को इन दोनों नौजवानों ने Excite कंपनी को बेचना चाहा। पर  कंपनी ने इस ऑफर को ठुकरा दिया। सभी कंपनियों के मना कर देने के बाद इन्होंने Andy Bechtolsheim नाम के investor को अपना प्रोजेक्ट बताया। Andy को वह प्रोजेक्ट बहुत अच्छा लगा। उसने  तुरंत 1 लाख डॉलर का चेक दोनों को दिया। इसके बाद कुछ और investor ने इसमें अपने पैसे लगाये। सितम्बर 4, 1998 में Google को एक कम्पनी में स्थापित किया गया।
लेकिन इंटरनेट की दुनिया मे कब्जा जमाना ओर राज करना इतना आसान नही होता जितना बाहर से सबको लगता है इसलिए 2008 से पहले अमेरिका से बाहर  शायद बहुत ही कम नेट यूजर होंगे जिन्होने गूगल का नाम सुना हो या इसका उपयोग किया हो 

धीरे धीरे अपने पेज रेंक के फोर्मूले के कारण गूगल लोगो मे चर्चित होता गया लेकिन गूगल के सामने भी सबसे बड़ी समस्या वही आ रही थी जिस कारण से याहू ओर ऑर्कुट भी बंद होने के कगार पर थे ऐसे मे गूगल ने एक नया फॉर्मूला निकाला जिसका नाम था  गूगल एडवर्ड जो गूगल के लिए नए नए एडवरटाइजर की व्यवस्था करता था ओर सर्च इंजन पर एड भी उस तरीके से लगाता था जिससे आम नेट यूर्ज्स को तकलीफ भी न हो ओर गूगल का कार्य भी बदस्तर जारी रहे गूगल का ये फार्मूला काम कर गया बड़ी बड़ी कंपनीया सस्ते दामो मे गूगल पर अपने विज्ञापन लगवाती ओर गूगल की गाड़ी चल पड़ी इसके बाद जो हुआ वो हेरतंगेज़ था क्योकि गूगल अपनी सारी कमाई छोटे मोटे सर्च इंजन वैबसाइट को खरीदने मे लगा रहा था गूगल समझ गया था की इस मार्केट मे पाँव जमाने है तो अपने प्रतिद्वंदी को आस पास भी नही भटकने देना है आप ये जान कर हेरान रह जाएंगे की वर्ष 2010 से लेकर आज तक गूगल हर सप्ताह एक कंपनी खरीद लेता है गूगल की दूरदर्शिता इसी से साबित हो जाती है की यू ट्यूब को उभरने से पहले ही गूगल ने करोड़ो मे खरीद लिया था जिसकी आज कीमत है लगभग 1.65 बिलियन डॉलर अर्थात  1,13,61,90,00,000रु  गूगल ने जब एंडरोइड खरीदा उसकी कीमत थी 50 मिलियन डॉलर अर्थात 3,44,30,00,000 रुपये 
इसके अलावा गूगल ने जो बड़ी शॉपिंग की उसमे मोटरोला वाज़ेइयर ओर डबलक्लिक जैसी बड़ी कंपनीया शामिल है अर्थात गूगल वालो का मेनेजमेंट इतना तगड़ा है की वे इस स्थिति को बेहतर समझ जाते है की कोनसी कंपनी उन्हे टक्कर देने वाली है ओर कोनसी कंपनी उनके लिए सोने का खजाना साबित हो सकती है  गूगल ने अपने नाम से मिलते जुलते सारे डोमेन खरीद लिए इसलिए आप कभी भी नेट पर गूगल सर्च करते हुए अगर स्पेलिंग गलत भी लिख दे तो भी गूगल की वैबसाइट ओपन हो जाती है 
इससे भी मजेदार बात ये है की आप www.466453.com सर्च करेंगे तो भी आपके सामने गूगल की साइट खुलेगी कारण की गूगल ने इस डोमेन को भी खरीद लिया है दरअसल  आप का मोबाइल किपैड जिसमे अल्फ़ाबेटिक वर्ड के साथ नंबर भी होते है वहाँ जब आप गूगल टाइप करेंगे तो 466453 नंबरो पर टाइप करना पड़ेगा ऐसे मे अगर गलती से अल्फ़ाबेटिक वर्ड की जगह नंबर भी टाइप हो जाए तो भी गूगल आपको अपने सर्च इंजन मे पहुंचा देगा शायद इसी लिए गूगल आज दुनिया मे टॉप पर है 

क्या गूगल सिर्फ सर्च इंजन का बादशाह है या पूरे इंटरनेट जगत का?????


आजकल नेट सर्फिंग करने वालो के दिमाग मे सबसे बड़ा यही सवाल है ओर इसका जवाब जानकर आप भी हेरान रह जाएंगे की गूगल से ऊपर भी कोई है जो आज के वक्त मे इंटरनेट का  बादशाह कहलाता है जिसका नाम है अमेजोंन 
जी हाँ गूगल सर्च इंजन बादशाह है बेशक लेकिन इंटरनेट का बादशाह आज भी अमेजोंन है क्योकि कंपनी की ग्रोथ ओर कमाई की बात करे तो अमेजोंन ने जिस गति से चढ़ाई की है इसके बारे मे खुद गूगल ने भी नही सोचा होगा वर्ष 2018 तक अमेजोंन ने 232 बिलियन डॉलर की कमाई कर ली थी जो सालाना इंटरनेट पर किसी भी वैबसाइट द्वारा की गयी अब तक की सबसे ज्यादा कमाई थी  अमेजोंन के अलावा माइक्रोसॉफ्ट एपल दोनों कंपनीया गूगल को बदस्तूर टक्कर दिये जा रही है गूगल को अपना सोशल प्रोडेक्ट Google+ हाल मे बंद करना पड़ा क्योकि सोशल मीडिया की दुनिया मे मार्क जुकेरबर्ग के  फेसबुक इंस्टाग्राम ओर व्हात्सप्प ने तहलका मचा रखा है उधर अमेजोंन वेब सर्विस ने गूगल क्लाउड को बुरी तरह पछाड़ दिया है आपको एक बात ओर  जानकर हेरानी हो सकती है की हाल के आंकड़ो के अनुसार दुनिया मे सबसे अमीर व्यक्ति अमेजोंन के मालिक जेफ़ बेजोस है जबकि दूसरे नंबर पर माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स सोशल मीडिया के बादशाह मार्क जुकेरबर्ग 8वे पायेदान पर है ओर गूगल के मालिक लेरी पेज 10वे नंबर पर 


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जहां दूसरी कंपनिया अच्छे प्रोडक्ट पर ध्यान लगाती है वही गूगल दूसरी कंपनियो पर नजर जमाए रखता है की कोनसी अच्छी है कोनसी हमे टक्कर देने वाली है ओर गूगल तुरंत उसे खरीद लेता है इसलिए सर्च इंजन के मामले मे गूगल को कोई टक्कर नही दे पाता 


अर्थात हम ये कह सकते है की बेशक गूगल आज भी सर्च इंजन के मामले मे दुनिया मे टॉप पर है ओर हाल फिलहाल कोई गूगल के करीब भी नही दिखता लेकिन अगर पूरी इंटरनेट दुनिया पर बादशाहत की बात की जाए तो अमेजोंन अब माइक्रोसॉफ्ट ओर गूगल दोनों को पछाड़ते हुए टॉप पर है 



बुधवार, जुलाई 24, 2019

Sachin tendulkar when sachin kidnapped


Sachin tendulkar when sachin kidnapped   


Sachin tendulkar when sachin kidnapped

किसी भी भारतीय से पूछिये सचिन कौन अर्थात उनके लिए सचिन शब्द का अर्थ ही क्रिकेट का भगवान है भले दूसरे विभिन्न क्षेत्रो मे सचिन नाम के किसी भी व्यक्ति ने ख्याति प्राप्त कर ली हो लेकिन 90 के दशक मे सचिन तेंदुलकर ने जो क्रिकेट मे नाम कमाया ऐसा कारनामा दूसरा कोई सचिन नही कर पाया भले वो सचिन खेदेकर जैसा अभिनेता हो या सचिन पाइलेट जैसा राजनेता 98 से 2005 तक जन्मे अधिकतर बच्चो के नाम उनके माँ बाप ने सचिन तेंदुलकर के नाम पर रखे जो आज 20 या 25 वर्ष के सचिन नाम के युवा घूम रहे है वे सब सचिन तेंदुलकर से प्रभावित नाम के आधार पर नामकरण तय करवाए गए थे
सचिन ने क्रिकेट को भारत मे प्रसिद्ध किया या क्रिकेट ने सचिन को लेकिन दोनों की जुगलबंदी से ऐसा समा जमा की जो क्रिकेट के शौकीन नही थे वे भी सिर्फ सचिन के देखने के लिए क्रिकेट मैच देखा करते थे और जो क्रिकेट प्रेमी थे वे भी सिर्फ सचिन के खेलने तक टीवी के सामने रहा करते थे ये वो दौर था जब भारत मे सचिन की बेटिंग के वक्त रोड सुनसान हो जाते थे और सचिन के आउट हो जाने पर टेलीविज़न सेट तक बंद हो जाया करते थे सिर्फ भारत ही नही जहां जहां क्रिकेट लोकप्रिय है वहाँ लोग सिर्फ सचिन की बेटिंग देखने स्टेडियम तक जाया करते थे चाहे शारजाह हो या सिडनी अर्थात सचिन की लोकप्रियता को कभी भी किसी से तुलनात्मक दृस्थि से नहीं आँका जा सकता है सचिन जैसे शूरमे सदियो मे एकाध जन्म लेते है
 आज हम बात करेंगे उन दिनों की जब भारतीय क्रिकेट उफान की तरफ बढ़ रहा था और सचिन कांबली कुंबले श्रीनाथ जैसे युवाओ का भारतीय टीम मे चयन हो चुका था ओर अपनी काबिलियत और प्रदर्शन के दम पर उन्होने साबित भी कर दिया था की वे भारतीय क्रिकेट का भविष्य है एव लंबी रेस के घोड़े है जो एकाध टेस्ट की असफलता से हार मानने वालो मे नही
 


Sachin tendulkar when sachin kidnapped


सचिन के अपहरण की कहानी



पिछले दिनों 26 जून को औस्ट्रेलिया के सिडनी के रहवासी आप्रवासी भारतीय होटल व्यवसाई अग्निरथ चौधरी ने अपने ट्विटर और फेसबुक अकाउंट पर एक फोटो पोस्ट की और याद दिला दिया 27 साल पुराना दिलचस्प किस्सा
दरअसल अग्निरथ चौधरी गुवाहाटी के मशहूर होटल व्यवसाई हेमेन्द्र दत्ता चौधरी के बेटे है जो हाल मे औस्ट्रेलिया रहते है बात 1992 के शुरुवाती दिनों की है जब भारतीय क्रिकेट  टीम गुवाहाटी एकदिवसीय मैच के लिए आई थी और टीम मे शामिल थे उभरते सितारे सचिन तेंदुलकर विनोद कांबली वेंकटपति राजू सलिल अंकोला ओर अनिल कुंबले भारतीय टीम उस वक्त होटल बेले व्यू मे रुकी थी चूंकि होटल बेले व्यू के निदेशक अग्निरथ के पिता हेमेन्द्र थे सो अग्निरथ की भी जान पहचान सभी खिलाड़ियो से हो गयी अग्निरथ ने उभरते सितारे सचिन से वादा किया की अगर भारतीय टीम ये मैच जीतती है तो वे उन्हे असम की हसीन वादियों की सेर करवाएगे वो भी उनकी खुद की कार मे (उस दौर मे क्रिकेटरों को बाहर घूमने पर इतनी बंदिश नही थी जितनी आज के दौर मे है) सो वादे के मुताबिक भारतीय टीम मैच जीत गयी और अग्निरथ के साथ बाहर घूमने जाना तय हुआ सचिन के साथ थे वेंकटपति राजू सलिल अंकोला एव अग्निरथ के मित्र विशी भुजेल
ये वो दौर था जब भारत के पूर्वोतर राज्यो मे उल्फा आतंकवाद चरम पर था आज भी यकीन नही होता की टीम मेनेजर अजित वाडेकर ने इन खिलाड़ियो को बाहर जाने की छूट कैसे दे दी होगी????
अग्निरथ सचिन राजू अंकोला सहित अपनी काले शीशे वाली मारुति वेंन मे गुवाहाटी शहर से बाहर निकले ओर असम की सुंदरता देखने हेतु प्रस्थान कर दिया दिन भर घूमने के बाद जब दोपहर भोजन का वक्त हुआ तो गुवाहाटी से 150किमी दूर एक ढाबे पर कार रोकी ओर अग्निरथ ढाबे वाले से खाने का मेन्यू पूछने चले गए तभी सचिन ने कार की खिड़की खोल बाहर का दृश्य निहारा ओर ढाबे वाले की नजर सचिन पर पड़ गयी अग्निरथ कुछ समझा पाते उससे पहले ही ढाबे के मालिक ने चिल्लाना शुरू कर दिया की सचिन का अपहरण हो गया किडनेप हो गया उल्फा वालों ने सचिन  का किडनेप कर लिया है अग्निरथ ओर सचिन समेत सभी साथी प्शोपेश मे थे की इस मुसीबत से निपटा कैसे जाये ऊपर से सुबह से बाहर घूमने के कारण पेट भी खाली सो जबरदस्त भूख अलग से परेशान कर रही थी ढाबा मालिक ने आनन फानन ने नजदीकी पुलिस ठाणे मे टेलीफोन घूमा दिया और सचिन तेंदुलकर के अपहरन की खबर सुन मात्र 15 मिनिट मे पुलिस भी ढाबे पर पहुँच गयी अब सचिन राजू ओर अंकोला को भी कार से उतरना पड़ा सचिन बार बार यकीन दिलाते रहे की हम सब साथी है और घूमने आए है लेकिन पुलिस ये मानने को तयार न थी अंतत सभी को लेकर होटल बेले व्यू गुवाहाटी ले जाया गया जहां रिशेप्शन रूम मे होटल निदेशक अग्निरथ के पिता हेमेन्द्र दत भारतीय टीम के कप्तान अज़हर और टीम मेनेजर अजित वाडेकर को बुलाया गया बड़ी मशक्कत के बाद लगभग 2 घंटे बाद यकीन दिलाया गया की तीनों क्रिकेट खिलाड़ी टीम मेनेजर की परमिशन से ही बाहर घूमने गए थे एवं होटल निदेशक का बेटा अग्निरथ उनका मित्र है जो अपनी निजी कार मे इन्हे घुमाने ले गया था

Sachin tendulkar when sachin kidnapped

रविवार, जुलाई 14, 2019

प्यार राजनीति और शतरंज का खेल

प्यार राजनीति और शतरंज का खेल


प्यार राजनीति और शतरंज का खेल 

हम भारतीय फिल्मों के बड़े शौकीन होते है और भारतीय फिल्में भी कहने को समाज का आईना
इसी फिल्मी आईने में देख कर कई युवा प्रेम में डूबे घर से भागे शादीयां भी की ओर कई जोड़े खुशनसीब रहे जो परिवार ने स्वीकार भी कर लिया कईयों ने इसकी कीमत अपनी जान देकर भी चुकाई
प्यार झुकता नही से लेकर हालिया रिलीज धड़क मुवी तक मे  लड़का लड़की घर से भाग कर शादी करने वाली वही कहानी बस प्रदर्शित करने का तरीका  ओर बस किरदार अलग थे
जनता कहती है की  फिल्मे युवाओ का रास्ता भटका देती है तो फिल्मकार कहते है हम तो वही दिखा रहे है जो समाज मे घटित हो रहा है अब  असलियत क्या है ये सब जानते है सो आज  का मुद्दा  ये कत्तई नही है
मुद्दा है राजनीतिक साजिश के तहत लड़की भगा ले जाना और फिर शतरंज की बिसात पर शह ओर मात का खुला खेल
ताजा ताजा मामला है बरेली के भाजपा विधायक राजेश मिश्र ओर उनके कर्मठ कार्यकर्ता अजितेश का
 ओर इसमे  मोहरा बनी  है विधायक जी की लाडली बेटी "साक्षी मिश्रा"चुनाव खत्म हो गए एव अब भारत भी विश्वकप से बाहर हो गया ऐसे में मीडिया को TRP बरकरार रखने के लिए ऐसा ही कोई मुद्दा चाइये था जिससे स्टूडियो में सुबह से लेकर शाम को 8 बजे वाले प्राइम टाइम शो तक रोनक बरकरार रहे सो मीडिया भी अपने चिर परिचित अंदाज में कूद गया इस शतरंज के खेल में ओर इसके बाद आम भारतीय जनता का रिएक्शन ओर अपने अपने हिसाब से रिव्यू
टीवी पर पोल क्रिएट हो रहे कि कितने लोग साक्षी के साथ है कितने खिलाफ जल्दी से हमे मेसेज करे ट्वीट करे etc
मानो आम भारतीयों के पास इसके अलावा करने को  अब कुछ बचा ही  न हो
बेशक मीडिया चौथा स्तम्भ है और जो दिखाता है देश की सच्चाई दिखाता है मेरा भी पसंदीदा क्षेत्र है लेकिन इस बार इस मुद्दे को हवा देने के लिए मीडिया द्वारा जो जातीय कार्ड खेला गया उससे अच्छे अच्छे बुद्धिजीवीयो को भी दो हिस्से में बांट दिया
अब आइये चलते है पूरे मामले की तरफ
राजेश मिश्रा बरेली उतर प्रदेश  से भाजपा के चुने हुए विधायक है जिनके बेटे है विक्की मिश्रा जिनकी खुद की कार्यकर्ताओ की एक अच्छी खासी फ़ौज है उनमें एक उभरता चेहरा भी है अजितेश जिसकी पार्टी के प्रति गतिविधियों से खुश होकर खुद राजेश मिश्रा उसे आगे बढ़ने के अवसर देते है
 धीरे धीरे विक्की से अजितेश की मित्रता इतनी प्रगाढ़ हो जाती है कि अजितेश विक्की के घर आते जाते रहते है विधायक जी से पार्टी के हर मुद्दे पर  सलाह मशविरा करते है ओर साथ मे खाना पीना भी होता है इस शतरंज में एक ओर कैरेक्टर है राजीव राणा कहने को विधायक जी के लँगोटिया यार ओर आजकल बिजनेस पार्टनर  लेकिन विधायक जी के इलेक्शन से लेकर सरकारी दौरे तक का खर्च जमा लाभ का हिसाब रखते है राणा जी अर्थात आप इन्हें विधायक परिवार के परमानेंट  सीए भी कह सकते है
विधायक जी की एक फूल सी बेटी भी है साक्षी मिश्रा जो आजाद ख्यालों की मल्लिका घर मे सबसे ज्यादा खुरापाती मस्तीखोर ओर लेकिन सबकी लाडली भी जिसे जो चाहे करने की आजादी और इसी आजादी की जिद पर वो बरेली से दूर जयपुर से अपनी  मिडिया एंड मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करना चाहती है जिसके लिए विधायक जी तैयार भी हो जाते है
उधऱ पार्टी गतिविधियों में सक्रिय अजितेश को अचानक नए व्यवसाय के लिए पैसो की जरूरत पड़ती है तो वो विधायक जी से गुहार करता है विधायक जी via राजीव राणा अजितेश को 1 करोड़ रु देने का हुक्म फरमा देते है बिना ये जाने की इसी 1 करोड़ के लिए आने वाले दिनों में उन्हें हिंदुस्तान भर में जलील होना पड़ेगा शायद विधायक जी इस भृम में जी रहे थे कि उभरता दलित नेता अजितेश उनके लिए दलित वोटबेंक का सबसे बड़ा जरिया बन कर उभरेगा ओर विधायक जी के 1 करोड़ के भरोसे का कारण भी वोटबेंक ही था
उधऱ चीनू उर्फ साक्षी को जयपुर पढ़ने भेज दिया जाता है कुछेक महीनों बाद राणा द्वारा अजितेश से बकाया रकम चुकाने हेतु फोन किया जाता है और अजितेश अगले महीने का वादा कर एकबारगी मामले को टालने की कोशिश करता है बस यही से शुरू होता है पैसे न लौटाने  ओर विधायक को जलील करने का राजनीतिक दांवपेंच वाला शतरंज का खेल जिसमे अहम भागीदार खुद  अजितेश के पिता भी शामिल होते है
विधायक जी के घर आने जाने साथ खाने पीने के कारण परिचित हो चुकी जयपुर पढ़ रही साक्षी मिश्रा जो अजितेश से 10 साल छोटी भी है से मिलना जुलना शुरू होता है फोन पर प्यार की पींगे बढती है और एक दिन आनन फानन में दोनों घर पर बताये बगैर भाग कर शादी करने का फैसला करते है पैसे की लेनदेन से अनभिज्ञ साक्षी को इस वक्त दुनिया में सिर्फ और सिर्फ अजितेश का प्रेम दिख रहा था और अंततः दोनों ने शादी कर ली
जब विधायक जी को इसके समाचार मिलते है तो वे कोप भवन में जाकर  साक्षी के जन्म से लेकर पालन पोषण वाली अद्भुत यादो में खोए खुद को कोसते से रह जाते है
इस पूरे घटनाक्रम से अनजान राजीव राणा जब अजितेश से बकाया 1 करोड़ लौटाने के लिए दुबारा फोन करते है तब शुरू होती है विधायक जी और उनके परिवार को जिल्लत करने वाली चाल
बकायदा साक्षी द्बारा अजितेश को साथ मे लेकर एक वीडियो वायरल किया जाता है कि उन्हें जान से मारने की धमकी दी जा रही है क्योकि उन्होंने घर से भाग कर शादी की है और अचानक अजितेश को भी याद आ जाता है कि वो तो  एक दलित है ये तो सरासर अत्याचार है भला दलित किसी सवर्ण कन्या से शादी क्यो नही कर सकता????वीडियो जापान से आई बुलेट ट्रेन की माफिक गति से वायरल होता है ओर भारत के प्रतिष्ठित चैनल आज तक से दोनों प्रेमी जोड़े को बुलावा मिलता है साथ मे आते है अजितेश के पिता जो ये बताने आते है कि अजितेश दलित का बेटा है जैसे पहले कभी अजितेश ने किसी को बताया ही न हो जैसे कभी विधायक के घर साथ मे उठना बैठना ओर खाना पीना भी न हुआ हो
ओर आजतक पर जो प्रसारित हुआ वो पूरे देश ने देखा किस तरह एक बेटी ने अपने माता पिता पर आरोप लगाए विधायक पिता भी फोन के मार्फ़त आजतक पर अपना स्पष्टीकरण देने आए और स्पष्ठ किया कि मेरी बेटी को पूर्ण आजादी दी हुई थी ओर आज भी है  मुझे कोई गुरेज नही वो चाहे जो करे वो बालिग है और उसने खुद फैसला लिया है चूंकि विधायक जी स्पष्ठ कर देते है कि उन्हें कोई आपत्ति नही है तो अजितेश ओर उसके पिता की दाल यहां नही गलती क्योकि विधायक जी ने इस रिश्ते को स्वीकारने से मना कर दिया सो पैसो का लेन देन तो अटका ही रह गया सो  अब निशाना राजीव राणा की तरफ लगाया जाता है ओर आरोप लगाए जाते है कि राजीव राणा उन्हें जान से मारना चाहते है क्योकि वो दलित है और उसने सवर्ण बालिका से शादी की है फिर टीवी के सामने राजीव भी आते है और स्पष्ठ कर देते है कि न तो मैने कोई कॉल किया न कोई आदमी भेजे मेरे  पैसे बकाया है अजितेश में बस  वे लोटा दीजिए बाकी आप भले चाहे जो करे हमे कोई मतलब नही
इसी बीच अलग अलग चैनलों पर एक ओर खबर वायरल होती है कि अजितेश पहले ही भोपाल में किसी लड़की से सगाई कर चुका है मिडिया में उस सगाई के  फोटो वायरल होते है साथ ही पड़ोसियों द्वारा आरोप लगाया जाता है कि अजितेश अय्याश किस्म का व्यक्ति है इसके लिए उसके फेसबुक एकाउंट yo yo abhi singh की पोस्टों का विवरण भी दिया जाता है आरोप प्रत्यारोपण का दौर जारी है अजितेश अपने पिता और पत्नी साक्षी के साथ टीवी चैनल के हर स्टूडियो में प्रस्तुति दे चुके है लेकिन कोई पुख्ता सबूत नही दे पाए है जिससे देश की आम जनता और  मिडिया को भी लगे कि हां उनके दलित होने के कारण ओर भाग कर शादी करने के कारण विधायक जी द्वारा इनको धमकाया गया हो या जान से मारने की कोशिश की हो
लेकिन बार बार पैसे के लेनदेन वाले प्रश्न पर अजितेश ओर उनके पिता दोनों चुप्पी साध लेते है और ढाल बनाया जाता है साक्षी को जो रोज नई कहानी लेकर परिवार पर आरोप लगा देती है
इन सब से दूर विधायक राजेश मिश्रा आज भी कोप भवन में बैठे है किसी की बेटी उसके बाप को  बगैर बताये भाग कर शादी कर ले ये किसी भी पिता के लिए सबसे बड़ा अपमान का घूंट होता है और पिता हमेशा सोचता ही रहता है कि आखिर लाड़ प्यार में कहाँ कमी आई थी जो बेटी ने कम से कम पूछा भी नही की वो अपनी मर्जी से शादी करना चाहती है या परिवार की रजामंदी से
अब तक हुए घटनाक्रम में शतरंज के दांवपेंच जारी है साक्षी के भागने के बाद वायरल हुए वीडियो के दौरान विधायक जी बैकफुट पर थें लेकिन जैसे जैसे प्यादों की चाले बाहर आई अब अजितेश ओर उनके पिता बैकफुट पर है
उधऱ राजीव राणा शतरंज के उस हाथी की तरह प्रतीत हो रहे है जो अपने दायरे में चाहे जो कर सकता है इसलिए राजीव दबी जुबान से ही सही लेकिन कहते जरूर है कि
" अजितेश किसी से भी शादी करे कही भी जाए मुझे मेरे 1 करोड़ वापस कर दे बस"

गुरुवार, जुलाई 11, 2019

2003 world cup जब याद आया 2003 का फ़ाइनल



2003 world cup

जब याद आया 2003 का फ़ाइनल











कल क्रिकेट विश्वकप 2019 के पहले सेमीफ़ाइनल मे लीग की टेबिल टॉप टीम इंडिया को न्यूजीलेंड ने 18 रन से हरा दिया और इसी के साथ 2019 विश्व कप मे भारतीय टीम का सफर यहीं खत्म हो गया ओर देश मे एक अलग सी बहस छिड़ गयी की हार का जिम्मेदार कौन????
सबकी अलग अलग राय है ओर विभिन्न कारण !
 कोई धोनी को दोष दे रहा है तो कोई कोहली से कप्तानी वापस लेने की बात कर रहा है ऐसा प्रतीत होता है जैसे देश के युवा सोशल मीडिया के मार्फत पूरी टीम ही बदल कर मानेंगे लेकिन शायद आज की जनरेशन को मालूम न हो एक ऐसा ही दौर मिलेनियम वर्ष मे भी आया था जब भारतीय टीम जीत के मुहाने पर जा कर हार गयी थी ओर हार इतनी बुरी थी की आज जिक्र करते भी दर्द महसूस होता है
जी हाँ हम बात कर रहे है 2003 विश्व कप फ़ाइनल की जब जोहन्स्बर्ग मे भारतीय टीम विश्व कप फ़ाइनल मे औस्ट्रेलिया के 360 के पहाड़ जैसे लक्ष्य का पीछा करते हुए ताश के पत्तों की तरह ढह गयी थी और 125 रन के बड़े अंतराल से हारी थी उस दिन भी लड़ रहा था तो अकेला सहवाग जैसे कल जाडेजा...
 आज भी याद है वो 23 मार्च 2003 का दिन था मेरा अगले दिन 12th बोर्ड का अकाउंट का पेपर लेकिन विश्व कप 4 साल मे आता है ओर टीम इंडिया 20 साल बाद फ़ाइनल पहुंची थी ऐसे सुनहरे मौके बार बार कहा मिलते है बताइये???? सो हमने तय किया की आज तो फ़ाइनल ही देखा जाएगा बोर्ड एग्जाम तो अगले साल भी दे सकते है न.....
लेकिन भारत की हार के बाद महसूस हुआ की यार इससे अच्छा थोड़े पढ़ ही लेते तो अकाउंट सबजेक्ट मे 48% से तो ज्यादा ही बनते
लेकिन भारत की इतनी बुरी हार के बावजूद देश लौटने पर खिलाडीयो का पलक पांवड़े बिछा कर स्वागत किया था भारतीय टीम को स्पोंसर कर रही कंपनी सहारा ने पुणे के एमबी वेल्लि मे सभी खिलाड़ियों को आधुनिक साज सज्जा से युक्त सुइट गिफ्ट किए थे जो खिलाड़ी जिस कंपनी मे कार्यरत था उस कंपनी से बहुत अच्छे इनाम मिले थे इसके अलावा बीसीसीआई से ढेर सारा पैसा अर्थात ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था की टीम फ़ाइनल हार कर आई हो????
आखिर ऐसा क्यो??
क्या सोशल मीडिया नही था इसलिए विरोध नही हुआ???
जी नही.... बिलकुल नही

लेकिन जो आप सोच रहे है कारण उससे बहुत ही अलग था दरअसल विश्व कप 2003 शुरू होने से पहले भारतीय टीम कप विजेता के लिए दुनिया भर मे सबसे पसंदीदा टीम थी और हो भी क्यो न?? जिस टीम मे भला सहवाग सचिन जैसे ओपनर हो गांगुली द्रविड़ जैसा मध्यक्रम हो फिर युवराज कैफ जैसे फिनिशर हो जाहीर श्रीनाथ नेहरा जैसे तेज गेंदबाज हो या भज्जी जैसे टर्मिनेटर स्पिनर ऐसी मझबूत भारतीय टीम काफी अरसे बाद बनी थी जिस पर विश्वास करते कहा जा सकता था की हाँ ये टीम वास्तव मे विश्व कप जीतने लायक है लेकिन विश्वकप शुरू होने से ठीक पहले न्यूजीलेंड के सामने हुई वन डे सीरीज मे भारतीय टीम की बुरी हार हुई भारत 7 मेचों की इस सीरीज मे 5/2 से हारा और विश्व कप से ठीक पहले भारतीय खिलाड़ियो का इतना लचर प्रदर्शन देश मे क्रिकेट प्रेमियों के मन को जबर्दस्त ठेस पहुंचा गया और इसके बाद विश्व कप शुरू होते ही औस्ट्रेलिया के सामने 125 रन पर आउट होकर टीम इंडिया ने देश भर मे गुस्से ओर विरोध का माहौल पैदा कर दिया और नतीजा ये हुआ की क्रिकेटरों के घर पत्थर फेंके गए उनके घर के सामने उनके पोस्टर जलाए गए गांगुली और सचिन के घरो के आगे सरकार द्वारा  पुलिस सुरक्षा लगानी पड़ी क्योकि आए दिन क्रिकेटरों के खिलाफ धरणे प्रदर्शन आगजनी हो रही थी भारत मे क्रिकेट किसी धर्म के माफिक है ओर खिलाड़ी देवता समान ऐसे मे भला कोई इतनी बड़ी हार को कैसे पचा सकता था बताइये?????
 भारत मे चल रहे इस घटनाक्रम से दूर भारतीय खिलाड़ी दक्षिण अफ्रीका मे विश्व कप के अगले मैच की त्यारी मे  जुट गए थे क भी मीडिया मे इस प्रोटेस्ट के बारे मे किसी खिलाड़ी का कोई ब्यान नही आया शायद टीम इंडिया तय कर चुकी थी की इसका जवाब अब हमे विश्व कप मे बेहतर प्रदर्शन से देना है ओर एक के बाद एक जीत के साथ भारतीय टीम अपने मिशन कप की तरफ बढ़ती गयी ओर विश्व कप मे सचिन का बल्ला जबरदस्त तरीके से बोल रहा था पाकिस्तान के खिलाफ वो मैच जहां सचिन ने 98 रन  बनाए शिवरात्रि का दिन था ओर ऐसा लग रहा था जैसे साक्षात शिव जी मैदान मे उतर तांडव नर्त्य कर रहे हो भारत ने सुपर सिक्स के दौरान उस न्यूजीलेंड को मात्र 146 पर ढेर कर दिया था जिसने विश्व कप से ठीक पहले भारत को बुरी शिख्स्त दी थी इस हार की ब्दोलत न्यूजीलेंड विश्व कप से बाहर हो गयी थी उस पूरे विश्व कप मे भारतीय टीम यूं खेली मानो इससे बेहतर टीम इस विश्व कप मे कोई और हो ही नही सकती पूरी वर्ल्ड कप सीरीज मे भारतीय टीम मात्र एक मैच हारी थी जो औस्ट्रेलिया के खिलाफ शुरुवाती दौर मे हुआ था और जिसके कारण खिलाड़ियो के घर प्रदर्शन हुए थे लेकिन इसके बाद सेमी फ़ाइनल तक का सफर इतना सुनहरा था की किसी भी भारतीय को गर्व महसूस हो
सेमी फ़ाइनल मे केन्या के खिलाफ गांगुली के वो बेहतरीन 111 रन जिसकी बदौलत इंडिया 90 रन से जीत कर 20 साल बाद पहली बार टीम इंडिया किसी विश्व कप के फ़ाइनल मे पहुंची थी अब देश मे माहौल बदल चुका था खिलाड़ियों की पूजा हो रही थी विश्व कप जीतने के लिए यज्ञ मिन्नते हो रही थी देश मे मौजूद सभी बड़ी कंपनियाँ जो किसी न किसी रूप मे टीम से या खिलाड़ियों से या बीसीसीआई से जुड़ी हुई थी वे अपने अपने स्तर पर इनाम घोषित कर रही थी मीडिया मे "बस वर्ल्ड कप घर आने ही वाला है" जैसे शो दिखाये जा रहे थे अर्थात पूरे देश को उम्मीद थी की भारत ये विश्व कप जीत कर ही आएगा लेकिन उम्मीद के विपरीत भारत फ़ाइनल मे भी उसी औस्ट्रेलिया के सामने 125 रन से हारा जिसने लीग दौर मे भारत को 125 रन पर समेट दिया था लेकिन भारत का संघर्ष काबिले तारीफ रहा भले फ़ाइनल मैच एकतरफा रहा हो क्योकि 1999 की विजेता औस्ट्रेलिया खिताब  बचाने उतरी थी जब की भारत के लिए फ़ाइनल का मैच पहला अनुभव था शायद यही वो फ़ाइनल था जिसने आगे भारत को दो दो विश्व कप जीतने की नींव रखी गांगुली ऐसे पहले कप्तान थे जिनहोने खिलाड़ियो को निडर होकर सामना करना सिखाया और उसी निडरता का नतीजा था की भारतीय टीम पहले 2007 मे पहला टी 20 विश्व कप जीती और बाद मे 2011 का विश्व कप
2003 फ़ाइनल मे खेलने वाले खिलाड़ियो मे सचिन सहवाग भज्जी युवराज नेहरा जाहीर खान जैसे खिलाड़ी 2011 के फ़ाइनल मे भी खेले और पूरे मैच मे एक पल के लिए भी नही लगा की भारतीय खिलाड़ी नर्वस लग रहे हो

बुधवार, जुलाई 10, 2019

90s का दशक और हम


90s का दशक और हम



90s का दशक और हम

बड़े खुशकिस्मत है वे लोग जिनका बचपन 90 के दशक मे बिता क्योकि उन्होने असल मायने मे देश और दुनिया को बदलते देखा था आजकल के बच्चे अपना बचपन नहीं जी रहे बल्कि बचपन को ढों रहे हो ऐसा प्रतीत होता है क्योकि अब ना तो वो पड़ोसी है न ही वो गल्ली मे सतोलिया, लट्टू और कंचे खेलने वाले यार

अब ना तो कहीं 5रु किराए वाला वीडियो गेम पार्लर है ना ही वो गुब्बारा फुलाने वाले अंकल अब मोहल्ले मे आते है और  ना ही वो 2रु देकर किराए की साईकिल लाकर केंची स्टाइल मे चलाते यार क्या बताऊँ कितना हसीन दौर था वो !


 शायद हम सब जिनका बचपन 90s के दौर मे बिता है  उनके लिए ज़िंदगी का सुनहरा दौर था जिसकी अब सिर्फ यादें शेष है


90s का दशक और हम



साल था 1991 गाँव मे पिताजी रेडियो पर समाचार सुनते थे बस वहीं मैंने भी पहली बार हिन्दी का उध्बोध्न सुना था जब से होश संभाला था क्योंकि गाँव सब देशी मारवाड़ी भाषा बोलने वाले लोग ओर सरकारी स्कूल मे एक ही मास्टर साहब थे जो हिन्दी पढ़ाते तो कम थे ओर मारवाड़ी मे बतियाते ज्यादा थे शायद इसी लिए शाम को विविध भारती पर बजने वाले फिल्मी गानो के ज़्यादातर बोल ऊपर से निकल जाते थे जैसे आज भी तमिल ओर तेलगु ऊपर से निकल जाया करती है फिर भी उस दौर के चर्चित गाने “ पायलिया, दिल दीवाना बिन सजना के, तू जब जब मुझको पुकारे”  जैसे गीतो के शुरुवाती शब्द जरूर गुनगुना लेते थे उस साल राजीव गांधी की हत्या ओर फिर हुए लोकसभा इलैक्शन के प्रचार मे राजीव गांधी का बड़ा सा पोस्टर लगाए घूमती जोंगा जीप ओर प्रचार मे बजने वाले गीत आज भी स्मृतिपटल पर अंकित है वर्ष 1992 मेरी ज़िंदगी के बदलाव का सबसे बड़ा साल था 6 वर्ष की आयु मे शिक्षा के लिए अजमेर प्रस्थान का निर्णय शायद मुझे बदलते भारत को बेहतर दृस्थि से देखने हेतु बड़ा अवसर दे रहा था वहाँ पहुँचते ही मुझे दुबारा पहली कक्षा मे दाखिल किया गया तब मन मे सवाल था गाँव से पहली पास कर के आया हूँ तो दुबारा पहली कक्षा ही क्यो????? क्योकि मैं तो हमारे मारवाड़ी बोलने वाले माड़ साहब से पढ़ कर पहली तो पास कर चुका हूँ न!!!लेकिन आज सोचता हूँ तो ज्ञात होता है परिजनो का वो सबसे बेहतर फैसला था 1992 अयोध्या आंदोलन के वक्त अजमेर संवेदनशील शहर होने के नाते अकसर क्र्फ़्यु लग जाया करता था लगभग तीन दिन स्कूल संडे समेत 4 दिन छुट्टी वाला दौर था वो ! टेलीविज़न के नाम पर बीपीएल का रंगीन टीवी मोजूद था चेनल के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन और ऊपर एल्युमीनियम वाला एंटीना जो सिर्फ संडे के दिन ही हम घुमाया करते थे क्योकि संडे की सुबह 7:30 रंगोली से लेकर मोगली चंद्रकांता ओर फिर डोनाल्ड डक के कार्टून पसंदीदा धारावाहिक हुआ करते थे शक्तिमान के आते ही बच्चो के लिए इस अलग सा क्रेज पैदा हो गया था शक्तिमान की स्टायल करते कई ब्च्चे छत से कूद अपनी जान गंवा बेठे थे इसलिए रविवार का दिन खास हुआ करता था लेकिन इसके अलावा शुक्रवार की रात हिन्दी फिल्म देखने के अलावा दूरदर्शन पर हम बच्चो के लिए देखने को कुछ खास न था शुक्रवार की रात भी फिल्म इसी शर्त पर देखी जाती थी अगर शनिवार स्कूल की छुट्टी हो तो

          90s का दशक और हम


मुझे आज भी याद है भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह की म्र्त्यु के वक्त दूरदर्शन पर लगातार 7 दिनों तक सिर्फ भजन कीर्तन चले थे और मन ही मन गुस्साये हमने  एंटीना घुमाना तक छोड़ दिया था वो ऐसा दौर था जब इंटरनेट एक कल्पना मात्र थीदूरदर्शन के अलावा टेप रिकॉर्डर भी मनोरंजन का सबसे बढ़िया जरिया था

तब गाने सुनने के लिए केसैट का कलेक्शन हर घर में मौजूद था। खास तरह के स्टैंड और अलमारी के शेल्फ में गानों और भजनों की केसैट (अनुराधा पोंडवाल ओर गुलशन कुमार के भजन) सभी के यहां हुआ करते थे। कुछ स्टैंड ऐसे थे जिनमें कवर सहित केसैट रखीं रहती थीं तो कुछ में बिना कवर के। इसके अलावा हर घर में केसैट रखने के लिए एक खास पैटर्न अपनाया जाता था वह गानों का अल्फाबेटिकल ऑर्डर हो सकता है, फिल्मों के नाम या उनके रिलीज होने का साल।  कैसेट्स खरीदना और दोस्तोा को सुनने को देना, उस समय की सबसे बड़ी खुशियों में से एक थी। आज तो व्हाकट्सअप या कई म्यूेजिक एप ने उस खुशी को कहीं न कहीं खत्म कर दिया है टेप रिकॉर्डर पर ही एक ही गाने को रिवर्स और फॉरवर्ड करके सुनने का आनंद ही कुछ और हुआ करता था 

टेप रिकॉर्डर के अलावा वीसीआर भी एक विकल्प था जहां बाहर से केसेट किराए पर मँगवा कर नई फिल्मे देखने का शौक पूरा किया जाता था लेकिन ये कभी कभार वाला एंजॉय मात्र था “हम आपके है कोन” फिल्म वीसीआर पर नही देखने का मलाल आज भी है क्योकि पाइरेसी की रोकथाम के लिए बड़जात्या ने विशेष कदम उठाए थे ओर फिल्म की वीडियो केसेट तब कहीं भी उपलब्ध नही थी ऐसे मे अंतत हमे भी अन्यों की तरह प्लाजा सिनेमा जाकर ही फिल्म देखनी पड़ी थी उस दौर मे कॉमिक भी मनोरंजन का अहम जरिया था चचा चोधरी साबू सुपरमेन की कॉमिक सबसे ज्यादा पढ़ी जाती थी लेकिन कॉमिक का दौर सिर्फ गर्मी की छुट्टियों मे ही आता था क्योंकि स्कूल डेज मे स्कूली किताबों के अलावा अन्य किताब पढ़ने पर पूर्णतया पाबंदी थी स्कूली दिनों की वो फाउंटेन पेन आज भी याद आती है जब क्लास मे दवात मे श्याई भर कर ले जाते थे ओर फिर फाउंटेन पेन मे डाला करते थे उस दौर का शायद ही कोई लड़का हो जिसने नीली श्याई से अपनी स्कूल यूनिफ़ोर्म खराब न की हो

 स्कूल मे चिंगम ले जाकर खाने का शगल भी बहुत प्रचलित था बबल गम उस दौर मे सबकी फेवरेट चिंगम थी क्लास मे चिंग्म खाते गुब्बारा फुलाना ओर क्लास मॉनिटर की शिकायत पर फिर डंडे खाना जैसे आम बात थी उस दौर मे गाँव तक टेलीफोन नहीं पहुंचे थे सो 50पैसे वाला पोस्ट कार्ड खरीद गाँव चिट्ठी लिखना ओर उसके जवाब के लिए अगले 15 दिनों तक रोज डाकिये का इंतजार करना एक अलग ही अनुभव था आज के दौर के बच्चे वीडियो कॉलिंग से बात कर लेते है वे क्या जाने चिट्ठी लिखते दिमाग मे कितने प्रकार के पॉज़िटिव ओर नेगेटिव ख्याल आते थे सोचना पड़ता था की घर वालो को क्या लिखा जाए ओर क्या नहीं आज भले मोबाइल मे 32 मेगा पिक्चल केमरा हो उस दौर मे फोटो स्टुडियो मे जाकर सीधे खड़े होकर राष्ट्रगाँन मुद्रा मे तस्वीर खिंचवाने का मजा ही अलग था ओर केमरे के क्लिक के बाद तस्वीर आने का इंतजार करना उससे भी ज्यादा मजेदार होता था 
फिर आया केबल टीवी का दौर उस जमाने मे सिर्फ जी टीवी ओर सोनी ही अधिकारिक प्राइवेट चेनल हुआ करते थे ओर क्रिकेट के लिए स्पेशल ESPN चेनल जैसे क्रिकेट प्रेमियो के लिए नई ज़िंदगी लेकर आया था केबल वाले की तरफ से 4/5 चेनल दिखाये जाते थे ये वो दौर था जब चालाक साधु च्ंद्रास्वामी ने पूरे देश को मूर्ख बना दिया था स्कूल से आते वक़्त हमने देखा की मंदिरो पर भीड़ उमड़ पड़ी है लोग गणेश जी को दुध पिलाने हेतु लाइनों मे लगे हुए है लोग बतिया रहे थे की भगवान प्रकट हो गए है प्रलय आने वाली है कलयुग ख़त्म होने वाला है दुनिया का शर्वनाश होने वाला है जब घर आकर समाचार देखे तो ज्ञात हुआ की चंद्रास्वामी ने गणेश जी को दूध पिलाया है ओर गणेश जी दूध पीते बाकायदा न्यूज चेनलों पर दीखाए जा रहे थे दरअसल कोर्ट मे चंद्रास्वामी की सुनवाई होनी थी सो देश का ध्यान भटकाने के लिए स्वामी ने सफेद मार्बल की मूर्ति पर चम्मच से दूध चढ़ाया जिससे  पास खड़े लोग भी झांसे मे आ गए अचानक से मीडिया मे आने के बाद खबर आग की तरह फेल गयी थी हम बच्चे थे सो हमे भी मानने के सिवाए कोई ठोस वेज्ञानिक कारण नजर नही आ रहा था जिससे चंद्रास्वामी को जूठा साबित कर पाएँ ये वो दौर था जब DDLJ फिल्म ने देश दुनिया मे डंका बजा दिया था ये वो दौर था जब जुरासिक पार्क वाला क्रेज ब्च्चो के दिमाग पर छाया था ये वो दौर था जब भारत 1996 मे भारत मे ही विल्स वर्ल्ड कप खेल रहा था ओर हम नए नए क्रिकेट प्रेमी बने थे सो भारत के मैच का बेसब्री से इंतजार रहता था बच्चो के मनोरजन के लिए वीडियो गेम जैसी नई तकनीक भी ईजाद हो चुकी थी जब हम 5 से 10रु घंटे के देकर वीडियो पार्लर पर कोन्त्रा, मारियो, ओर ब्रायन लारा क्रिकेट खेलने जाया करते थे इसके बाद एक मिनी वीडियो गेम ईजाद हुआ जो हम घरवालो से जिद कर के भी मँगवाने मे कामयाब रहे थे इस वीडियो गेम मे अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दुबारा खेलने मे जो अनुभूति प्राप्त होती थी वो आज किसी भी बड़े अचिवमेंट को हासिल करने पर भी नहीं होती ये वो दौर था जब हम साल भर मे प्रधानमंत्री बदलते देख रहे थे 1996 मे वाजपेयी फिर देवगोड़ा जिनका पूरा नाम लेना किसी बड़े पहाड़ पर चढ़ने जैसा होता था हरदन हल्ली दोडागोड़ा देवगोड़ा इतना बड़ा नाम था की बच्चो ने इस नाम पर चुट्कुले बना लिए थे ओर इसके तुरंत बाद साल भर मे नए प्रधानमंत्री बने इंद्र कुमार गुजराल देश मे बदलती राजनीतिक गतिविधियों से अनभिज्ञ हम साइकील छोड़ स्कूटर चलाना सीख रहे थे “हमारा बजाज” विज्ञापन का असर जनमानस पर इतना गहरा हुआ था की 100 मे से 80 टूविलर्स बजाज के चेतक ओर वेस्पा स्कूटर थे जिसके साइलेंसर की आवाज सुनने के लिए आज कान तरस जाते है देश मे एम्बेसेडर ओर मारुति800 के सर्किल से बाहर निकल टाटा सूमों शेरा ओर सफारी जैसी नई कारे भी बन रही थी ओर लोग इसे पसंद भी कर रहे थे इन सब से बेहतर टाटा ने इंडिका कार निकाली थी उसका लोगो मे हद से ज्यादा क्रेज था ये ग्राहक को एम्बेसेडर मारुति ओर एस्टीम से ज्यादा सहलुयित देती थी ये राजस्थान पत्रिका की हुकूमत को चुनोती देने वाला दौर था मुझे आज भी याद है वर्ष 1998 मे पहली बार राजस्थान पत्रिका की मोनोपोली खतम करने उतरा कलर अखबार दैनिक भास्कर जो कलरफूल ओर स्टायलिश होने के साथ खबर मे चटपटा तड़का भी लगाता था भास्कर का पहला संस्करण अजमेर से ही प्रकाशित हुआ था ओर लोगो ने इसे हाथो हाथ स्वीकार भी किया ऊपर से भास्कर की आकर्षक उपहार योजना जिसके लिए लोग अपना पारंपरिक अखबार पत्रिका तक त्याग उपहार पाने हेतु कार्यालय के आगे लाइन तक लगा रहे थे    वर्ष 1998/99 का दौर देश मे माँल ओर मल्टीप्लेक्स के निर्माण का दौर था बड़ी तेजी से छोटे एवं सीमित शहरो मे भी बड़ी बड़ी बिल्डिंगों का निर्माण हो रहा था  उधर क्रिकेट पर बीसीसीआई ने बादशाहत हासिल कर ली थी आईसीसी को सबसे ज्यादा मुनाफा भारत मे होने वाली सीरीज से ही होता था लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने वाजपेयी भी दिल्ली लाहोर बस सेवा की शुरुवात कर चुके थे जिसे दोस्ती का नया पेगाम समझा गया और इधर हमारे होठों की ऊपरी सतह पर भरभृरी मुंछे उग रही थी ये वो समय था जब हम बच्चे से किशोर जीवन की तरफ दस्तक दे रहे थे साल 1999 की गर्मीया भुलाए नही भूलती एक तरफ इंगलेंड मे चल रहा वर्ल्ड कप दूसरी तरफ भारत पाकिस्तान के बीच करगिल युद्ध  चूंकि छुट्टियों मे गाँव आए हुए थे तो गांवो मे अब तक टीवी सेट ओर टेलीफोन कनैक्शन आ चुके थे लेकिन केबल चेनल का प्रदापण नही हुआ था ओर बिजली की गज़ब की असुविधा के कारण सिर्फ शाम के समाचार ही दूरदर्शन पर देख पाते थे इसलिए देश दुनिया को जानने का एक मात्र सहारा था गाँव की मुख्य दुकान पर आने वाला अखबार राजस्थान पत्रिका क्योकि भास्कर का बस 2 साल पहले ही जन्म हुआ था सो शहरों के अलावा दूर सुदूर गांवों तक भास्कर की इतनी पेंठ भी नही थी क्योकि कलरफूल होने के बावजूद भास्कर मे  न्यूज कम ओर एडवरटाइज़ ज्यादा आते थे इसलिए गांवो मे पत्रिका अधिकतर पढ़ा जाता था पत्रिका मे 1999 कार्गिल युद्ध की खबरे पहले पन्ने पर होती थी ओर नीचे रोज शहीद होने वाले बहादुर सेनिकों की नाम के साथ सूची उस कियोष्क मन को अंदर से झकझोर देती थी 
अब बहुत कुछ बदल चुका है न वो बचपन है न वो चीजें जिन्हें हमने बचपन मे जिया आज टेक्नोलेजी का दौर है आजकल के बच्चे दिन भर टीवी या मोबाइल पर गेम लेकर बैठ जाते है उन्हे इल्म नही की फ्रिक्वेंसि नही पकड्ने पर हम घंटो घंटो छत पर एंटीना घुमाया करते थे वो भी बिना किसी डाइरेक्शन के सिर्फ नीचे खड़े भाई की आवाज लगाने के आधार पर आजकल के बच्चो को इल्म नही की हम 5रु लेकर जाते थे ओर वीडियो गेम पार्लर वाला सिर्फ आधा घंटा ही खेलने देता था वो भी इस शर्त पर की अगले का समय पूरा होगा तब तक इंतजार करना पड़ेगा आज कल के बच्चे धूप के डर से बाहर तक नही निकलते हम गर्मीयों मे घर आते थे तब सब दोस्त मिलकर गाँव मे बने तालाब मे नहाने जरूर जाया करते थे 
समय बदल गया है अब ना वो चीजें रही न वो बचपन अगर दुबारा कभी फिर से ज़िंदगी जीने का मौका मिला तो मे उस 90s के दौर को ही फिर से जीना पसंद करूंगा 



क्रिकेट जगत का पहला फिक्स मैच ओर बॉलीवुड कनैक्शन 53 साल पुरानी सच्ची घटना

क्रिकेट जगत का पहला फिक्स मैच ओर बॉलीवुड कनैक्शन 53 साल पुरानी सच्ची घटना  जिस तरह आज कल क्रिकेट जगत मे फिक्सिंग का साया अक्सर मंडर...