त्रिनिनाद से मद्रास तक " रॉबिन सिंह" - khabar buzz

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रविवार, जून 23, 2019

त्रिनिनाद से मद्रास तक " रॉबिन सिंह"


जो 90's के दौर मे बड़े हुए ओर क्रिकेट के शौकीन थे वे शायद ही भूल सकते है रॉबिन सिंह को रॉबिन सिंह की आतिशी बेटिंग को रोबिंन सिंह की कहर बरपाती गेंदो को ओर उनकी चीते जैसी फील्डिंग को
जी हा आज भी याद है वो टाइटन कप सीरीज वो अक्टूम्बर का महिना ओर वो रॉबिन सिंह का कमबेक
वर्ष 1989 मे वेस्टइंडीज की टिम के खिलाफ सीरीज के लिए पहली बार एक ऐसे लड़के का चयन हुआ था जो जन्मजात वेस्टइंडियन था लेकिन मूलत: भारतीय जी हाँ रॉबिन सिंह का पूरा नाम रॉबिन रांम नारायन सिंह है ओर उनके दादा लगभग 80 वर्ष पहले ब्रिटिश हुकूमत के आदेश के जरिए त्रिनिनाद मे मजदूरी करने गए थे रॉबिन सिंह के दादा मूलत: राजस्थान के अजमेर शहर के रहवासी थे रॉबिन सिंह का जन्म 14 सितम्बर 1963 को प्रिंसटाउन त्रिनिनाद मे हुआ था वर्ष 1982 मे रॉबिन सिंह शिक्षा हेतु भारत आए एवं मद्रास यूनिवर्सिटी मे एडमिशन लिया वर्ष 1984 मे रॉबिन सिंह का प्रथम श्रेणी क्रिकेट मे प्रवेश हुआ ओर 1986 मे तमिलनाडू 36 साल बाद पहली बार रणजी ट्रॉफी जीती जिसके हीरो रॉबिन सिंह थे अपने ऑलराउंड पर्दर्शन के कारण रॉबिन अखबारो की सुर्ख़ियो मे आ चुके थे 1987 मे होने वाले रिलायन्स वर्ल्ड कप हेतु चयन समिति की नजरे काफी युवा चेहरे पर थी जिसमे रॉबिन सिंह भी एक नाम था लेकिन त्रिनिनाद का पासपोर्ट ओर नागरिकता के चलते रॉबिन सिंह की जगह नवजोत सिद्धू का चयन हुआ भारत मे खेले गए उस वर्ल्ड कप मे भारतीय टिम सेमीफाइनल तक पहुंची थी जब रॉबिन सिंह को ज्ञात हुआ की उनके राष्ट्रीय टिम मे चयन के बीच उनकी वेस्टिंडियन नागरिकता आड़े आ रही हा तो उन्होने तुरंत पासपोर्ट रद्द करवाया एव भारतीय नागरिकता के लिए अपलाई किया ओर रॉबिन सिंह का ये इंतजार खत्म हुआ वर्ष 1989 मे ओर संजोग देखिये रॉबिन अपना पहला मेच भी उसी देश के खिलाफ खेले जहां उनका जन्म हुआ था रॉबिन सिंह को दो मेचो मे मौका मिला ओर दोनों मे दुर्भाग्यवश तरीके से रॉबिन सिंह को 7वे नंबर पर बेटिंग के लिए भेजा गया ओर ओवर भी पूरे नही करवाए गए उस सीरीज के बाद रॉबिन बाहर कर दिये गए कई क्रिकेट विशेषज्ञो ने तो कह दिया था की "Robin's Game Over" ओर हो भी क्यो नही क्योकि उसके बाद तो रॉबिन का कही चांस ही नही बना कांबली सचिन जडेजा जैसे बैट्समेन तो श्रीनाथ कुंबले जैसे नए गेंदबाजों का भारत की टिम मे चयन हो चुका था ओर 1992 विश्व कप चयन के वक़्त रॉबिन का नाम 30 खिलाड़ियो मे भी नही था
लेकिन सभी घटनाक्रम से परे रॉबिन हताशा से दूर अपने खेल मे मग्न थे ओर तमिलनाडू टिम के लिए लगातार रणजी मेच खेले जा रहे थे ओर अच्छा प्रदर्शन किए जा रहे थे
फिर एक ऐसा दौर आया जब भारत 1996 विश्व कप मे हार चुकी थी ओर टीम मे सचिन की कप्तानी मे रोज नए नए फेरबदल हो रहे थे जिसमे राहुल द्रविड़ सोरव गांगुली के साथ साथ एक ऐसे खिलाडी का भी चयन हुआ था जो 1989 मे मात्र 2 मेच खेलने के बाद 7 साल बाद वापस टीम मे लोटा था जिसका नाम था रॉबिन सिंह
ओर ऐसा कमबेक किया की दुबारा कभी चयनकर्ताओ ने रॉबिन को टीम से नही निकाला बल्कि स्वत रॉबिन ने 2001 मे बढ़ती उम्र का हवाला देकर सन्यास ले लिया
रॉबिन सिंह की बेहतरीन पारियो मे 1998 जनवरी मे बांगलादेश के ढाका मे खेला गया इंडिपेंडेंस कप का फ़ाइनल जहां भारत पाकितान के सामने 316 के बड़े लक्षय का पीछा कर रही थी ओर सचिन के रूप मे भारत का पहला विकेट 68 रन पर गिर चुका था उस वक़्त तीसरे नंबर पर बेटिंग करने आए रॉबिन सिंह ने 86 रन की जोरदार पारी खेली ओर सौरव गांगुली के साथ महत्वपूर्ण शतकीय साझेदारी की ओर भारत के महत्वपूर्ण मेच मे जीत की नींव रखी जिसे अंत मे पूरा किया ऋषिकेश कनित्कर ने चोका लगाकर
इसके अलावा अपने क्मबेक सीरीज टाइटन कप के सेमीफ़ाइनल मेच मे औस्ट्रेलिया के खिलाफ मुश्किल परिस्थिति मे रॉबिन सिंह ने जो दो विकेट निकाले जिसमे एक स्टुआर्ट लॉं जैसे आतिशी बल्लेबाज का भी विकेट था उसके बाद माइकल बेवन का वो केच आज भी भुलाए नही भुला जाता उस दौर की औस्ट्रेलिया चेम्पियन टीम इस हार के बाद कप से बाहर हो गयी थी ओर ये टीम इंडिया के लिए 1993 हीरो कप के बाद पहली अद्भुद सफलता थी जेबी टीम कोई त्रिकोणिए सीरीज मे फ़ाइनल मे पहुंची थी ओर उसके बाद अफ्रीका को हरा कर टाइटन कप पर भी कब्जा किया था रॉबिन सिंह वर्ष 1996 से 2001 तक भारतीय टीम का मझबूत स्तम्भ रहे जो म्ध्यक्र्म मे टीम की रीड की हड्डी माना जाता था गेंदबाजी मे पेनी धार वेकटेश श्रीनाथ का बाकी काम आसान कर देती थी ओर फील्डिंग ?????
भारतीय टीम की फील्डिंग मे असल जान तो रॉबिन सिंह के आने के बाद ही आई वरना पहले खिलाड़ी चोट के डर से डाइव लगाकर तो कभी केच की कोशिश भी नही किया करते थे ओर फील्डिंग करते वक़्त पास से चोका भी जाये तो पीछे भागने के बजाए बाउंड्री लाइन से बॉल उठाकर ही लाते थे
36 की उम्र मे रोबिन सिंह को करामाती फील्डिंग करते देख अन्य खिलाड़ियो मे भीं जोश भर चुका था उसके बाद जडेजा की फील्डिंग ओर संजय मांजरेकर द्वारा वो स्टीव वोंघ का केच कोन भूल सकता हैं
सन्यास के बाद रोबिन सिंह बीसीसीआई से जुड़े रहे एवं इंडिया A टीम के फील्डिंग कोच बने गोतम गंभीर ओर रोबिन उट्ठप्पा दोनों खिलाड़ी रोबिन सिंह की खोज माने जाते है आईपीएल के शुरुवाती दौर मे रोबिन सिंह 2009 मे डेक्कन चार्जर्स टीम के कोच बने ओर 2009 मे डेक्कन चार्जर्स ने अपना पहला ओर एकमात्र आईपीएल खिताब जीता उसके बाद रोबिन सिंह मुंबई इंडियंस के फील्डिंग कोच बने जो आज भी उसी पद पर कायम है
याद रहे मुंबई इंडियन भी 4 आईपीएल खिताब जीत चुकी है


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