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2003 world cup जब याद आया 2003 का फ़ाइनल



2003 world cup

जब याद आया 2003 का फ़ाइनल











कल क्रिकेट विश्वकप 2019 के पहले सेमीफ़ाइनल मे लीग की टेबिल टॉप टीम इंडिया को न्यूजीलेंड ने 18 रन से हरा दिया और इसी के साथ 2019 विश्व कप मे भारतीय टीम का सफर यहीं खत्म हो गया ओर देश मे एक अलग सी बहस छिड़ गयी की हार का जिम्मेदार कौन????
सबकी अलग अलग राय है ओर विभिन्न कारण !
 कोई धोनी को दोष दे रहा है तो कोई कोहली से कप्तानी वापस लेने की बात कर रहा है ऐसा प्रतीत होता है जैसे देश के युवा सोशल मीडिया के मार्फत पूरी टीम ही बदल कर मानेंगे लेकिन शायद आज की जनरेशन को मालूम न हो एक ऐसा ही दौर मिलेनियम वर्ष मे भी आया था जब भारतीय टीम जीत के मुहाने पर जा कर हार गयी थी ओर हार इतनी बुरी थी की आज जिक्र करते भी दर्द महसूस होता है
जी हाँ हम बात कर रहे है 2003 विश्व कप फ़ाइनल की जब जोहन्स्बर्ग मे भारतीय टीम विश्व कप फ़ाइनल मे औस्ट्रेलिया के 360 के पहाड़ जैसे लक्ष्य का पीछा करते हुए ताश के पत्तों की तरह ढह गयी थी और 125 रन के बड़े अंतराल से हारी थी उस दिन भी लड़ रहा था तो अकेला सहवाग जैसे कल जाडेजा...
 आज भी याद है वो 23 मार्च 2003 का दिन था मेरा अगले दिन 12th बोर्ड का अकाउंट का पेपर लेकिन विश्व कप 4 साल मे आता है ओर टीम इंडिया 20 साल बाद फ़ाइनल पहुंची थी ऐसे सुनहरे मौके बार बार कहा मिलते है बताइये???? सो हमने तय किया की आज तो फ़ाइनल ही देखा जाएगा बोर्ड एग्जाम तो अगले साल भी दे सकते है न.....
लेकिन भारत की हार के बाद महसूस हुआ की यार इससे अच्छा थोड़े पढ़ ही लेते तो अकाउंट सबजेक्ट मे 48% से तो ज्यादा ही बनते
लेकिन भारत की इतनी बुरी हार के बावजूद देश लौटने पर खिलाडीयो का पलक पांवड़े बिछा कर स्वागत किया था भारतीय टीम को स्पोंसर कर रही कंपनी सहारा ने पुणे के एमबी वेल्लि मे सभी खिलाड़ियों को आधुनिक साज सज्जा से युक्त सुइट गिफ्ट किए थे जो खिलाड़ी जिस कंपनी मे कार्यरत था उस कंपनी से बहुत अच्छे इनाम मिले थे इसके अलावा बीसीसीआई से ढेर सारा पैसा अर्थात ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था की टीम फ़ाइनल हार कर आई हो????
आखिर ऐसा क्यो??
क्या सोशल मीडिया नही था इसलिए विरोध नही हुआ???
जी नही.... बिलकुल नही

लेकिन जो आप सोच रहे है कारण उससे बहुत ही अलग था दरअसल विश्व कप 2003 शुरू होने से पहले भारतीय टीम कप विजेता के लिए दुनिया भर मे सबसे पसंदीदा टीम थी और हो भी क्यो न?? जिस टीम मे भला सहवाग सचिन जैसे ओपनर हो गांगुली द्रविड़ जैसा मध्यक्रम हो फिर युवराज कैफ जैसे फिनिशर हो जाहीर श्रीनाथ नेहरा जैसे तेज गेंदबाज हो या भज्जी जैसे टर्मिनेटर स्पिनर ऐसी मझबूत भारतीय टीम काफी अरसे बाद बनी थी जिस पर विश्वास करते कहा जा सकता था की हाँ ये टीम वास्तव मे विश्व कप जीतने लायक है लेकिन विश्वकप शुरू होने से ठीक पहले न्यूजीलेंड के सामने हुई वन डे सीरीज मे भारतीय टीम की बुरी हार हुई भारत 7 मेचों की इस सीरीज मे 5/2 से हारा और विश्व कप से ठीक पहले भारतीय खिलाड़ियो का इतना लचर प्रदर्शन देश मे क्रिकेट प्रेमियों के मन को जबर्दस्त ठेस पहुंचा गया और इसके बाद विश्व कप शुरू होते ही औस्ट्रेलिया के सामने 125 रन पर आउट होकर टीम इंडिया ने देश भर मे गुस्से ओर विरोध का माहौल पैदा कर दिया और नतीजा ये हुआ की क्रिकेटरों के घर पत्थर फेंके गए उनके घर के सामने उनके पोस्टर जलाए गए गांगुली और सचिन के घरो के आगे सरकार द्वारा  पुलिस सुरक्षा लगानी पड़ी क्योकि आए दिन क्रिकेटरों के खिलाफ धरणे प्रदर्शन आगजनी हो रही थी भारत मे क्रिकेट किसी धर्म के माफिक है ओर खिलाड़ी देवता समान ऐसे मे भला कोई इतनी बड़ी हार को कैसे पचा सकता था बताइये?????
 भारत मे चल रहे इस घटनाक्रम से दूर भारतीय खिलाड़ी दक्षिण अफ्रीका मे विश्व कप के अगले मैच की त्यारी मे  जुट गए थे क भी मीडिया मे इस प्रोटेस्ट के बारे मे किसी खिलाड़ी का कोई ब्यान नही आया शायद टीम इंडिया तय कर चुकी थी की इसका जवाब अब हमे विश्व कप मे बेहतर प्रदर्शन से देना है ओर एक के बाद एक जीत के साथ भारतीय टीम अपने मिशन कप की तरफ बढ़ती गयी ओर विश्व कप मे सचिन का बल्ला जबरदस्त तरीके से बोल रहा था पाकिस्तान के खिलाफ वो मैच जहां सचिन ने 98 रन  बनाए शिवरात्रि का दिन था ओर ऐसा लग रहा था जैसे साक्षात शिव जी मैदान मे उतर तांडव नर्त्य कर रहे हो भारत ने सुपर सिक्स के दौरान उस न्यूजीलेंड को मात्र 146 पर ढेर कर दिया था जिसने विश्व कप से ठीक पहले भारत को बुरी शिख्स्त दी थी इस हार की ब्दोलत न्यूजीलेंड विश्व कप से बाहर हो गयी थी उस पूरे विश्व कप मे भारतीय टीम यूं खेली मानो इससे बेहतर टीम इस विश्व कप मे कोई और हो ही नही सकती पूरी वर्ल्ड कप सीरीज मे भारतीय टीम मात्र एक मैच हारी थी जो औस्ट्रेलिया के खिलाफ शुरुवाती दौर मे हुआ था और जिसके कारण खिलाड़ियो के घर प्रदर्शन हुए थे लेकिन इसके बाद सेमी फ़ाइनल तक का सफर इतना सुनहरा था की किसी भी भारतीय को गर्व महसूस हो
सेमी फ़ाइनल मे केन्या के खिलाफ गांगुली के वो बेहतरीन 111 रन जिसकी बदौलत इंडिया 90 रन से जीत कर 20 साल बाद पहली बार टीम इंडिया किसी विश्व कप के फ़ाइनल मे पहुंची थी अब देश मे माहौल बदल चुका था खिलाड़ियों की पूजा हो रही थी विश्व कप जीतने के लिए यज्ञ मिन्नते हो रही थी देश मे मौजूद सभी बड़ी कंपनियाँ जो किसी न किसी रूप मे टीम से या खिलाड़ियों से या बीसीसीआई से जुड़ी हुई थी वे अपने अपने स्तर पर इनाम घोषित कर रही थी मीडिया मे "बस वर्ल्ड कप घर आने ही वाला है" जैसे शो दिखाये जा रहे थे अर्थात पूरे देश को उम्मीद थी की भारत ये विश्व कप जीत कर ही आएगा लेकिन उम्मीद के विपरीत भारत फ़ाइनल मे भी उसी औस्ट्रेलिया के सामने 125 रन से हारा जिसने लीग दौर मे भारत को 125 रन पर समेट दिया था लेकिन भारत का संघर्ष काबिले तारीफ रहा भले फ़ाइनल मैच एकतरफा रहा हो क्योकि 1999 की विजेता औस्ट्रेलिया खिताब  बचाने उतरी थी जब की भारत के लिए फ़ाइनल का मैच पहला अनुभव था शायद यही वो फ़ाइनल था जिसने आगे भारत को दो दो विश्व कप जीतने की नींव रखी गांगुली ऐसे पहले कप्तान थे जिनहोने खिलाड़ियो को निडर होकर सामना करना सिखाया और उसी निडरता का नतीजा था की भारतीय टीम पहले 2007 मे पहला टी 20 विश्व कप जीती और बाद मे 2011 का विश्व कप
2003 फ़ाइनल मे खेलने वाले खिलाड़ियो मे सचिन सहवाग भज्जी युवराज नेहरा जाहीर खान जैसे खिलाड़ी 2011 के फ़ाइनल मे भी खेले और पूरे मैच मे एक पल के लिए भी नही लगा की भारतीय खिलाड़ी नर्वस लग रहे हो

टिप्पणियां

  1. अनाम13/7/19, 5:04 pm

    aap achcha content likh rhe hai lekin ek baat kahna chahta hu ki aapki posts seo friendly nhi hai jisse chalte aapko in par organic traffic milna mushkil hai. Visheshkar post url and title ko optimize kare

    जवाब देंहटाएं
  2. ध्न्यवाद सलाह हेतु लेकिन आप गूगल पर जाकर सर्च कीजिये "पहला फिक्स मैच" आपको गूगल सर्च के पहले पेज पर 2nd पोस्ट इस वैबसाइट की मिलेगी जबकि मुझे ये सब शुरू किए महिना भी नही हुआ है 20 जून से प्रोपर सब शुरू किया था

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अनाम15/7/19, 5:01 pm

      ji nhi mila. kya aapne apne browser me incognito mode me jakar search kiya hai. agr nhi to check kare! Thanks again

      हटाएं
  3. बहुत सुंदर लिखा आपने। 2003 की यादें मेरे मन में अभी भी ताज़ा हैं।
    पहले मैच में हम हॉलैंड से खेल रहे थे और जैसे तैसे जीत पाए थे। दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया से वो हार वाक़ई दिल तोड़ने वाली थी।
    और कुछ ऐसा ही था 2007 में बांग्लादेश से हारकर पहले दौर में ही बाहर हो जाना।

    आज का तो पता नहीं मगर उस वक़्त की क्रिकेट दिमाग से नहीं दिल से देखी जाती थी।
    आपका उत्तर पढ़कर उन लम्हों को मैंने दोबारा जी लिया।
    धन्यवाद

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