90s का दशक और हम - khabar buzz

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बुधवार, जुलाई 10, 2019

90s का दशक और हम


90s का दशक और हम



90s का दशक और हम

बड़े खुशकिस्मत है वे लोग जिनका बचपन 90 के दशक मे बिता क्योकि उन्होने असल मायने मे देश और दुनिया को बदलते देखा था आजकल के बच्चे अपना बचपन नहीं जी रहे बल्कि बचपन को ढों रहे हो ऐसा प्रतीत होता है क्योकि अब ना तो वो पड़ोसी है न ही वो गल्ली मे सतोलिया, लट्टू और कंचे खेलने वाले यार

अब ना तो कहीं 5रु किराए वाला वीडियो गेम पार्लर है ना ही वो गुब्बारा फुलाने वाले अंकल अब मोहल्ले मे आते है और  ना ही वो 2रु देकर किराए की साईकिल लाकर केंची स्टाइल मे चलाते यार क्या बताऊँ कितना हसीन दौर था वो !


 शायद हम सब जिनका बचपन 90s के दौर मे बिता है  उनके लिए ज़िंदगी का सुनहरा दौर था जिसकी अब सिर्फ यादें शेष है


90s का दशक और हम



साल था 1991 गाँव मे पिताजी रेडियो पर समाचार सुनते थे बस वहीं मैंने भी पहली बार हिन्दी का उध्बोध्न सुना था जब से होश संभाला था क्योंकि गाँव सब देशी मारवाड़ी भाषा बोलने वाले लोग ओर सरकारी स्कूल मे एक ही मास्टर साहब थे जो हिन्दी पढ़ाते तो कम थे ओर मारवाड़ी मे बतियाते ज्यादा थे शायद इसी लिए शाम को विविध भारती पर बजने वाले फिल्मी गानो के ज़्यादातर बोल ऊपर से निकल जाते थे जैसे आज भी तमिल ओर तेलगु ऊपर से निकल जाया करती है फिर भी उस दौर के चर्चित गाने “ पायलिया, दिल दीवाना बिन सजना के, तू जब जब मुझको पुकारे”  जैसे गीतो के शुरुवाती शब्द जरूर गुनगुना लेते थे उस साल राजीव गांधी की हत्या ओर फिर हुए लोकसभा इलैक्शन के प्रचार मे राजीव गांधी का बड़ा सा पोस्टर लगाए घूमती जोंगा जीप ओर प्रचार मे बजने वाले गीत आज भी स्मृतिपटल पर अंकित है वर्ष 1992 मेरी ज़िंदगी के बदलाव का सबसे बड़ा साल था 6 वर्ष की आयु मे शिक्षा के लिए अजमेर प्रस्थान का निर्णय शायद मुझे बदलते भारत को बेहतर दृस्थि से देखने हेतु बड़ा अवसर दे रहा था वहाँ पहुँचते ही मुझे दुबारा पहली कक्षा मे दाखिल किया गया तब मन मे सवाल था गाँव से पहली पास कर के आया हूँ तो दुबारा पहली कक्षा ही क्यो????? क्योकि मैं तो हमारे मारवाड़ी बोलने वाले माड़ साहब से पढ़ कर पहली तो पास कर चुका हूँ न!!!लेकिन आज सोचता हूँ तो ज्ञात होता है परिजनो का वो सबसे बेहतर फैसला था 1992 अयोध्या आंदोलन के वक्त अजमेर संवेदनशील शहर होने के नाते अकसर क्र्फ़्यु लग जाया करता था लगभग तीन दिन स्कूल संडे समेत 4 दिन छुट्टी वाला दौर था वो ! टेलीविज़न के नाम पर बीपीएल का रंगीन टीवी मोजूद था चेनल के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन और ऊपर एल्युमीनियम वाला एंटीना जो सिर्फ संडे के दिन ही हम घुमाया करते थे क्योकि संडे की सुबह 7:30 रंगोली से लेकर मोगली चंद्रकांता ओर फिर डोनाल्ड डक के कार्टून पसंदीदा धारावाहिक हुआ करते थे शक्तिमान के आते ही बच्चो के लिए इस अलग सा क्रेज पैदा हो गया था शक्तिमान की स्टायल करते कई ब्च्चे छत से कूद अपनी जान गंवा बेठे थे इसलिए रविवार का दिन खास हुआ करता था लेकिन इसके अलावा शुक्रवार की रात हिन्दी फिल्म देखने के अलावा दूरदर्शन पर हम बच्चो के लिए देखने को कुछ खास न था शुक्रवार की रात भी फिल्म इसी शर्त पर देखी जाती थी अगर शनिवार स्कूल की छुट्टी हो तो

          90s का दशक और हम


मुझे आज भी याद है भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह की म्र्त्यु के वक्त दूरदर्शन पर लगातार 7 दिनों तक सिर्फ भजन कीर्तन चले थे और मन ही मन गुस्साये हमने  एंटीना घुमाना तक छोड़ दिया था वो ऐसा दौर था जब इंटरनेट एक कल्पना मात्र थीदूरदर्शन के अलावा टेप रिकॉर्डर भी मनोरंजन का सबसे बढ़िया जरिया था

तब गाने सुनने के लिए केसैट का कलेक्शन हर घर में मौजूद था। खास तरह के स्टैंड और अलमारी के शेल्फ में गानों और भजनों की केसैट (अनुराधा पोंडवाल ओर गुलशन कुमार के भजन) सभी के यहां हुआ करते थे। कुछ स्टैंड ऐसे थे जिनमें कवर सहित केसैट रखीं रहती थीं तो कुछ में बिना कवर के। इसके अलावा हर घर में केसैट रखने के लिए एक खास पैटर्न अपनाया जाता था वह गानों का अल्फाबेटिकल ऑर्डर हो सकता है, फिल्मों के नाम या उनके रिलीज होने का साल।  कैसेट्स खरीदना और दोस्तोा को सुनने को देना, उस समय की सबसे बड़ी खुशियों में से एक थी। आज तो व्हाकट्सअप या कई म्यूेजिक एप ने उस खुशी को कहीं न कहीं खत्म कर दिया है टेप रिकॉर्डर पर ही एक ही गाने को रिवर्स और फॉरवर्ड करके सुनने का आनंद ही कुछ और हुआ करता था 

टेप रिकॉर्डर के अलावा वीसीआर भी एक विकल्प था जहां बाहर से केसेट किराए पर मँगवा कर नई फिल्मे देखने का शौक पूरा किया जाता था लेकिन ये कभी कभार वाला एंजॉय मात्र था “हम आपके है कोन” फिल्म वीसीआर पर नही देखने का मलाल आज भी है क्योकि पाइरेसी की रोकथाम के लिए बड़जात्या ने विशेष कदम उठाए थे ओर फिल्म की वीडियो केसेट तब कहीं भी उपलब्ध नही थी ऐसे मे अंतत हमे भी अन्यों की तरह प्लाजा सिनेमा जाकर ही फिल्म देखनी पड़ी थी उस दौर मे कॉमिक भी मनोरंजन का अहम जरिया था चचा चोधरी साबू सुपरमेन की कॉमिक सबसे ज्यादा पढ़ी जाती थी लेकिन कॉमिक का दौर सिर्फ गर्मी की छुट्टियों मे ही आता था क्योंकि स्कूल डेज मे स्कूली किताबों के अलावा अन्य किताब पढ़ने पर पूर्णतया पाबंदी थी स्कूली दिनों की वो फाउंटेन पेन आज भी याद आती है जब क्लास मे दवात मे श्याई भर कर ले जाते थे ओर फिर फाउंटेन पेन मे डाला करते थे उस दौर का शायद ही कोई लड़का हो जिसने नीली श्याई से अपनी स्कूल यूनिफ़ोर्म खराब न की हो

 स्कूल मे चिंगम ले जाकर खाने का शगल भी बहुत प्रचलित था बबल गम उस दौर मे सबकी फेवरेट चिंगम थी क्लास मे चिंग्म खाते गुब्बारा फुलाना ओर क्लास मॉनिटर की शिकायत पर फिर डंडे खाना जैसे आम बात थी उस दौर मे गाँव तक टेलीफोन नहीं पहुंचे थे सो 50पैसे वाला पोस्ट कार्ड खरीद गाँव चिट्ठी लिखना ओर उसके जवाब के लिए अगले 15 दिनों तक रोज डाकिये का इंतजार करना एक अलग ही अनुभव था आज के दौर के बच्चे वीडियो कॉलिंग से बात कर लेते है वे क्या जाने चिट्ठी लिखते दिमाग मे कितने प्रकार के पॉज़िटिव ओर नेगेटिव ख्याल आते थे सोचना पड़ता था की घर वालो को क्या लिखा जाए ओर क्या नहीं आज भले मोबाइल मे 32 मेगा पिक्चल केमरा हो उस दौर मे फोटो स्टुडियो मे जाकर सीधे खड़े होकर राष्ट्रगाँन मुद्रा मे तस्वीर खिंचवाने का मजा ही अलग था ओर केमरे के क्लिक के बाद तस्वीर आने का इंतजार करना उससे भी ज्यादा मजेदार होता था 
फिर आया केबल टीवी का दौर उस जमाने मे सिर्फ जी टीवी ओर सोनी ही अधिकारिक प्राइवेट चेनल हुआ करते थे ओर क्रिकेट के लिए स्पेशल ESPN चेनल जैसे क्रिकेट प्रेमियो के लिए नई ज़िंदगी लेकर आया था केबल वाले की तरफ से 4/5 चेनल दिखाये जाते थे ये वो दौर था जब चालाक साधु च्ंद्रास्वामी ने पूरे देश को मूर्ख बना दिया था स्कूल से आते वक़्त हमने देखा की मंदिरो पर भीड़ उमड़ पड़ी है लोग गणेश जी को दुध पिलाने हेतु लाइनों मे लगे हुए है लोग बतिया रहे थे की भगवान प्रकट हो गए है प्रलय आने वाली है कलयुग ख़त्म होने वाला है दुनिया का शर्वनाश होने वाला है जब घर आकर समाचार देखे तो ज्ञात हुआ की चंद्रास्वामी ने गणेश जी को दूध पिलाया है ओर गणेश जी दूध पीते बाकायदा न्यूज चेनलों पर दीखाए जा रहे थे दरअसल कोर्ट मे चंद्रास्वामी की सुनवाई होनी थी सो देश का ध्यान भटकाने के लिए स्वामी ने सफेद मार्बल की मूर्ति पर चम्मच से दूध चढ़ाया जिससे  पास खड़े लोग भी झांसे मे आ गए अचानक से मीडिया मे आने के बाद खबर आग की तरह फेल गयी थी हम बच्चे थे सो हमे भी मानने के सिवाए कोई ठोस वेज्ञानिक कारण नजर नही आ रहा था जिससे चंद्रास्वामी को जूठा साबित कर पाएँ ये वो दौर था जब DDLJ फिल्म ने देश दुनिया मे डंका बजा दिया था ये वो दौर था जब जुरासिक पार्क वाला क्रेज ब्च्चो के दिमाग पर छाया था ये वो दौर था जब भारत 1996 मे भारत मे ही विल्स वर्ल्ड कप खेल रहा था ओर हम नए नए क्रिकेट प्रेमी बने थे सो भारत के मैच का बेसब्री से इंतजार रहता था बच्चो के मनोरजन के लिए वीडियो गेम जैसी नई तकनीक भी ईजाद हो चुकी थी जब हम 5 से 10रु घंटे के देकर वीडियो पार्लर पर कोन्त्रा, मारियो, ओर ब्रायन लारा क्रिकेट खेलने जाया करते थे इसके बाद एक मिनी वीडियो गेम ईजाद हुआ जो हम घरवालो से जिद कर के भी मँगवाने मे कामयाब रहे थे इस वीडियो गेम मे अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दुबारा खेलने मे जो अनुभूति प्राप्त होती थी वो आज किसी भी बड़े अचिवमेंट को हासिल करने पर भी नहीं होती ये वो दौर था जब हम साल भर मे प्रधानमंत्री बदलते देख रहे थे 1996 मे वाजपेयी फिर देवगोड़ा जिनका पूरा नाम लेना किसी बड़े पहाड़ पर चढ़ने जैसा होता था हरदन हल्ली दोडागोड़ा देवगोड़ा इतना बड़ा नाम था की बच्चो ने इस नाम पर चुट्कुले बना लिए थे ओर इसके तुरंत बाद साल भर मे नए प्रधानमंत्री बने इंद्र कुमार गुजराल देश मे बदलती राजनीतिक गतिविधियों से अनभिज्ञ हम साइकील छोड़ स्कूटर चलाना सीख रहे थे “हमारा बजाज” विज्ञापन का असर जनमानस पर इतना गहरा हुआ था की 100 मे से 80 टूविलर्स बजाज के चेतक ओर वेस्पा स्कूटर थे जिसके साइलेंसर की आवाज सुनने के लिए आज कान तरस जाते है देश मे एम्बेसेडर ओर मारुति800 के सर्किल से बाहर निकल टाटा सूमों शेरा ओर सफारी जैसी नई कारे भी बन रही थी ओर लोग इसे पसंद भी कर रहे थे इन सब से बेहतर टाटा ने इंडिका कार निकाली थी उसका लोगो मे हद से ज्यादा क्रेज था ये ग्राहक को एम्बेसेडर मारुति ओर एस्टीम से ज्यादा सहलुयित देती थी ये राजस्थान पत्रिका की हुकूमत को चुनोती देने वाला दौर था मुझे आज भी याद है वर्ष 1998 मे पहली बार राजस्थान पत्रिका की मोनोपोली खतम करने उतरा कलर अखबार दैनिक भास्कर जो कलरफूल ओर स्टायलिश होने के साथ खबर मे चटपटा तड़का भी लगाता था भास्कर का पहला संस्करण अजमेर से ही प्रकाशित हुआ था ओर लोगो ने इसे हाथो हाथ स्वीकार भी किया ऊपर से भास्कर की आकर्षक उपहार योजना जिसके लिए लोग अपना पारंपरिक अखबार पत्रिका तक त्याग उपहार पाने हेतु कार्यालय के आगे लाइन तक लगा रहे थे    वर्ष 1998/99 का दौर देश मे माँल ओर मल्टीप्लेक्स के निर्माण का दौर था बड़ी तेजी से छोटे एवं सीमित शहरो मे भी बड़ी बड़ी बिल्डिंगों का निर्माण हो रहा था  उधर क्रिकेट पर बीसीसीआई ने बादशाहत हासिल कर ली थी आईसीसी को सबसे ज्यादा मुनाफा भारत मे होने वाली सीरीज से ही होता था लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने वाजपेयी भी दिल्ली लाहोर बस सेवा की शुरुवात कर चुके थे जिसे दोस्ती का नया पेगाम समझा गया और इधर हमारे होठों की ऊपरी सतह पर भरभृरी मुंछे उग रही थी ये वो समय था जब हम बच्चे से किशोर जीवन की तरफ दस्तक दे रहे थे साल 1999 की गर्मीया भुलाए नही भूलती एक तरफ इंगलेंड मे चल रहा वर्ल्ड कप दूसरी तरफ भारत पाकिस्तान के बीच करगिल युद्ध  चूंकि छुट्टियों मे गाँव आए हुए थे तो गांवो मे अब तक टीवी सेट ओर टेलीफोन कनैक्शन आ चुके थे लेकिन केबल चेनल का प्रदापण नही हुआ था ओर बिजली की गज़ब की असुविधा के कारण सिर्फ शाम के समाचार ही दूरदर्शन पर देख पाते थे इसलिए देश दुनिया को जानने का एक मात्र सहारा था गाँव की मुख्य दुकान पर आने वाला अखबार राजस्थान पत्रिका क्योकि भास्कर का बस 2 साल पहले ही जन्म हुआ था सो शहरों के अलावा दूर सुदूर गांवों तक भास्कर की इतनी पेंठ भी नही थी क्योकि कलरफूल होने के बावजूद भास्कर मे  न्यूज कम ओर एडवरटाइज़ ज्यादा आते थे इसलिए गांवो मे पत्रिका अधिकतर पढ़ा जाता था पत्रिका मे 1999 कार्गिल युद्ध की खबरे पहले पन्ने पर होती थी ओर नीचे रोज शहीद होने वाले बहादुर सेनिकों की नाम के साथ सूची उस कियोष्क मन को अंदर से झकझोर देती थी 
अब बहुत कुछ बदल चुका है न वो बचपन है न वो चीजें जिन्हें हमने बचपन मे जिया आज टेक्नोलेजी का दौर है आजकल के बच्चे दिन भर टीवी या मोबाइल पर गेम लेकर बैठ जाते है उन्हे इल्म नही की फ्रिक्वेंसि नही पकड्ने पर हम घंटो घंटो छत पर एंटीना घुमाया करते थे वो भी बिना किसी डाइरेक्शन के सिर्फ नीचे खड़े भाई की आवाज लगाने के आधार पर आजकल के बच्चो को इल्म नही की हम 5रु लेकर जाते थे ओर वीडियो गेम पार्लर वाला सिर्फ आधा घंटा ही खेलने देता था वो भी इस शर्त पर की अगले का समय पूरा होगा तब तक इंतजार करना पड़ेगा आज कल के बच्चे धूप के डर से बाहर तक नही निकलते हम गर्मीयों मे घर आते थे तब सब दोस्त मिलकर गाँव मे बने तालाब मे नहाने जरूर जाया करते थे 
समय बदल गया है अब ना वो चीजें रही न वो बचपन अगर दुबारा कभी फिर से ज़िंदगी जीने का मौका मिला तो मे उस 90s के दौर को ही फिर से जीना पसंद करूंगा 



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