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सोमवार, जुलाई 08, 2019

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“उस रोज प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के पास बार बार टेलीफोन आ रहा था की उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को तुरंत सूचित कीजिये स्टेट गेस्ट हाउस मे अप्रिय घटना घटित हो सकती है तुरंत ज़ाब्ता भेजा जाये” ये टेलीफोन था भारत के नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी का जो गेस्ट हाउस मे मीटिंग ले रही बसपा नेता मायावती की जान को लेकर चिंतित थे

चलिए चलते है अयोध्या आंदोलन के दौर मे जब अचानक ही देश मे चारों तरफ से राष्ट्रवाद उभरती ज्वाला के माफिक उफान मार रहा था लालकृष्ण आडवाणी के नेत्रत्व मे निकली रथ यात्रा ओर बिहार पहुँचते ही लालू की दबंगाई ओर उसके बाद 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या मे जो हुआ वो इतिहास मे दर्ज है ठीक इसके 3 महीने बाद उत्तर प्रदेश मे विधानसभा चुनाव हुए राष्ट्रवाद से लबरेज भारतीय जनता पार्टी जोश के साथ इस चुनाव मे उतरी थी यूपी मे भाजपा के उतराधिकारी कल्याण सिंह को पूरी उम्मीद थी की भाजपा बम्पर जीत के साथ यूपी पर कब्जा करेगी उधर कांग्रेस परिवर्तन के दौर से गुजर रही थी राजीव गांधी की म्रत्यु के बाद कांग्रेस शीर्ष सत्ता पर तो काबिज थी लेकिन राज्यो मे कांग्रेस के लिए उथल पुथल का दौर चल रहा था ऐसे मे पहली बार साथ आए दलित नेता कांशीराम ओर ओबीसी नेता मुलायम सिंह उम्मीदों के विपरीत गठजोड़ हुआ ओर यूपी मे 1993 मे सपा बसपा की सम्मिलित सरकार बनी जिसमे मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह तब एक नारा बढ़ा प्रचलित हुआ था “ मिल गए मुलायम काशीराम हवा मे उड़ गए जय श्रीराम”  बसपा अपने 67 विधायको के साथ सपा को समर्थन दे रही थी अस्थिर  सरकार के दौरान आपसी गतिरोध ओर छूट पूट घटनाओ के साथ 2 वर्ष निकल चुके थे तभी अचानक बसपा सुप्रीमो काशीराम की तबीयत बिगड़ी और काशीराम का हाल जानने दिल्ली अस्पताल पहुंची मायावती

Mayawati

वर्ष 1977 मे एक सर्वदलिय राजनेतिक अधिवेशन मे 21 वर्षीय बालिका मंच से उन राजबहादुर जैसे नामी नेता को जवाब दे रही थी जिन्होने 1977 लोकसभा चुनाव मे इंद्रा गांधी को 50 हजार से ज्यादा मतो से हराया था अधिवेशन मे बैठे दलित नेता काशीराम को मायावती का ये लहजा बहुत पसंद आ गया काशीराम उस दौर मे वामसेफ को मझबूत करने मे लगे थे चूंकि काशीराम पंजाब से थे इसलिए उन्हे यूपी मे अपनी जमीन तराशने के लिए यूपी से ही किसी दमदार चेहरे की जरूरत थी जो उस शाम अधिवेशन मे पूरी हो गयी काशीराम के अनुरोध पर मायावती अपनी सिविल सर्विसेज की पढ़ाई बीच मे छोड़ राजनीति मे प्रवेश कर गयी ओर अपने पहले चुनाव समेत लगातार 3 चुनाव हारे फिर भी नहीं टूटा तो बस मायावती का धेर्य ओर काशीराम की उम्मीदे
ओर अंतत पहली बार 1993 मे बसपा सपा के सहयोग से यूपी सरकार मे शामिल हुई.
जब मायावती हॉस्पिटल पहुंची जयंत मल्होत्रा( काशीराम के बिजनेस पार्टनर) उन्हे काशीराम से मिलाने अंदर तक ले गए मायावती की आंखो मे आँसू थे क्योकि बसपा के वारीश ओर अपने राजनीतिक गुरु बीमार पड़े काशीराम मायावती को आशा भरी निगाहों से देख रहे थे काशीराम ने दबती आवाज मे मायावती से कहा “ यूपी की मुख्यमंत्री बनोगी???? “ मायावती को लगा की काशी जी कुछ ज्यादा ही बीमार है सो उनके पास गयी ओर अपने हाथ से उनका सिर सहलाने लगी तभी काशीराम ने अपने तकिये के नीचे से कुछ पत्र उठाए ओर मायावती की तरफ कर दिये मायावती पत्र देख कर हेरान थी क्योकि पत्र मे भाजपा द्वारा बसपा को समर्थन देकर यूपी मे सत्ता परिवर्तन की चाबी अंकित थी मायावती ने जयंत मल्होत्रा की तरफ देखा तो उन्होने गर्दन से हामी भरी दरअसल ये व्ही जयंत मल्होत्रा थे जो आरएसएस प्रमुख रज्जु भैया के करीबी माने जाते थे ओर रज्जु भैया के मार्फत काशीराम ओर वाजपेयी की मुलाक़ात भी मल्होत्रा ने ही करवाई थी हालांकि आडवाणी इस गठजोड़ के खिलाफ थे ओर उनके सिपहसलार क्ल्यान सिंह भी  
   मई 1995 मे हॉस्पिटल मे घटित घटनाक्रम आने वाले दिनों मे यूपी मे जबर्दस्त उथल पुथल के संकेत दे रहा था मायावती ने लखनऊ पहुँचते ही अपने विधायकों की आपात बैठक बुलाई ओर 2 जून को मीरा रोड स्थित सरकारी स्टेट गेस्ट हाउस पहुँचने को कहा उधर गुप्त सूत्रो के मार्फत मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को भनक लग चुकी थी सरकार को समर्थन दे रही बसपा पार्टी मे क्या खिचड़ी पक रही है???


2 जून 1995 स्टेट गेस्ट हाउस लखनऊ

 राजनीतिक तोड़ फोड़ मे माहिर मूलायम सिंह ने बसपा के 12 विधायक तोड़ अपने दल की तरफ कर लिए थे लेकिन ये नाकाफी था बाकी बचे 55 विधायकों के साथ मायावती स्टेट गेस्ट हाउस के सुइट नंबर 2 मे बैठक ले रही थी सुइट नंबर 1 भी मायावती के विश्राम हेतु बुक था मायावती ओर बसपा विधायकों के अलावा मायावती के मुहबोले भाई ओर फर्रूकाबाद से भाजपा विधायक ब्रहमदत्त द्वीवेदी भी साथ थे तभी मुख्यमंत्री के आदेश पर सपा के कुछ विधायकों एव समर्थको का गुट कुछेक दबंग गुंडो के साथ गेस्ट हाउस मे प्रवेश करता है बाहर खड़े मीडिया के कुछेक पत्रकार उनको रोकते है ओर समझाते भी है लेकिन सत्ता की भूख क्या न करवाए सपा समर्थको पर इसका कोई असर नहीं हुआ मुख्यमंत्री कार्यालय से पुलिस वालों तक को ये निर्देश थे की जो होगा होने दिया जाये इसलिए पुलिस फोर्स मात्र ओपचारिकता हेतु लगाई गयी थी जो गेस्ट हाउस मे प्रवेश करते हुए तोड़ फोड़ कर रहे सपा समर्थको को देखने के अलावा चाय की चुसकियाँ लेने के कोई विशेष कार्य नहीं कर रही थी सिर्फ एक  SHO जो हजरतगंज थानाधिकारी थे ओर स्टेट गेस्ट हाउस उनके अंतर्गत ही आता था उन्होने भीड़ को खदेड़ने की कोशिश की तो एसपी महोदय से निर्देश आया की जो हो रहा है होने दिया जाए लेकिन फिर भी sho का जमीर नही माना ओर उन्होने अपने थाने के पुलिस कर्मियों को आदेश दिया की गुंडो को बाहर खदेड़ा जाये ओर sho कुछ हद तक कामयाब भी हुए ओर मेन गैट बंद कर दिया गया लेकिन 50 के लगभग समाजवादी समर्थक गेस्ट हाउस के अंदर प्रवेश कर चुके थे गेस्ट हाउस की बिजली काट दी गयी थी और थोड़ फोड़ जारी थी ओर उस कमरे को ढूंढा जा रहा था जहां मायावती विधायकों की मीटिंग ले रही थी अंतत सुइट नंबर 2 के बाहर दरवाजे पर एक साथ हो हुल्लड़ की आवाज आई अंदर बैठे विधायक एव मायावती अब तक समझ चुकी थी की खतरा बस दरवाजे के बाहर खड़ा है भाजपा विधायक ब्रहम्दत्त ने भाजपा कार्यालय फोन लगाया एव इसकी सूचना दी भाजपा प्रदेश कार्यालय से दिल्ली कार्यालय फोन गया एव अटल जी को इसकी सूचना दी गयी अटल जी ने तुरंत प्रधानमंत्री राव को टेलीफोन कर तुरंत राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की
उधर गेस्ट हाउस मे सुइट no 2 का दरवाजा टूट चुका था ओर बसपा विधायको एव सपा समर्थको मे आपस मे लड़ाई हाथापाई जारी थी एक सपा समर्थक मायावती की तरफ बढ़ा तो पास खड़े ब्रहमदत्त ने कुर्सी उठाकर उस सपाई के सिर पर दे मारी ब्रहमदत्त संघ की शाखाओ मे जाते थे वे लट्ठ चलाने मे पूर्णतया निपुण थे ओर इसी करामात को उन्होने कुर्सी के जरिए आजमाया एक गुंडे के कुर्सी लगते ही बाकी सचेत हो गए तभी बमुशकील से मायावती को मना कर सुइट नंबर 1 मे ले जाया गया साथ मे ब्रहमदत्त एवं 5 बसपा विधायक गए जबकि 2 नंबर मे हाथापाई जारी थी बाहर खड़ा मीडिया सब कवरेज कर रहा था लेकिन अंदर जाने की इजाजत उन्हे भी नहीं थी इसी घटनाक्रम के बीच राज्यपाल मोतीलाल वोरा( वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष ) द्वारा अपने अधिकारो का प्रयोग कर तुरंत लखनऊ डीजीपी को आदेश दिया जाता है और फिर पुलिस प्रशासन हरकत मे आता है सभी गुंडों को बाहर खदेड़ा जाता है गर उस रोज वाजपेयी प्रधानमंत्री को सूचित नही करते ओर प्रधानमंत्री कार्यालय से राज्यपाल को अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करने हेतु नही कहा जाता तो गुंडे मायावती की ह्त्या की ही नियत से गेस्ट हाउस मे घुसे थे पुलिस के हरकत मे आते ही सारे सपा समर्थक भाग खड़े हुए गेस्ट हाउस को चारो तरफ से घेर कर छावनी मे तब्दील किया गया एव अगली सुबह मायावती भाजपा के समर्थन से अपनी सरकार बनाने का दावा पेश करने राज्यपाल के पास गयी इसके बाद जो हुआ सबको पता है पहली बार उत्तर प्रदेश मे किसी दलित ने मुख्यमंत्री की शपथ ली ओर इसके बाद 2 बार ओर मायावती मुख्यमंत्री बनी लेकिन

जब संसद मे वाज्येपी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो मायावती ने उस वाजपेयी के खिलाफ वोट किया और सरकार गिराई जिस वाजपेयी ने 2 जून के रोज मायवाती की जान बचाई थी शायद इसलिए लोग राजनीति को गंदी परिभाषाओ से संबोधित भी करते है इसका एक उदाहरण 2010 की लखनऊ की एक प्रेस कान्फ्रेंस मे भी मिलता है जब मुख्यमंत्री मायावती पत्रकारो के सवालो के जवाब दे रही थी एक पत्रकार ने मायावती के हाथी की मूर्तियाँ लगवाने को लेकर सवाल किया तो मायावती भड़क उठी और पत्रकार को बुरा भला कहने लगी तभी एक वरिष्ठ पत्रकार खड़े हुए ओर मायावती को 2 जून 1995 की घटना याद दिलाते हुए कहा की याद कीजिये उस दिन पत्रकार लॉबी मुख्यमंत्री मुलायम नही बल्कि आपके साथ खड़ी थी मायावती को अपनी गलती का अहसास हुआ ओर तुरंत सभी पत्रकारो से माफी भी मांगी ये हिंदुस्तान मे ऐसा पहला वाकया था जब किसी मुख्यमंत्री ने पत्रकार से माफी मांगी हो
राजनीति स्ंभावनाओं का खेल है इसमे कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन कभी नहीं रहता लेकिन लोगो मे आम राय थी की अब बसपा सपा तो कभी एक मंच पर नहीं आएगे लेकिन 2019 का आम चुनाव और मोदी की सुनामी के आगे सभी छोटे बड़े दल एक हो रहे थे ऐसे मे 24 साल पुराने गीले शिकवे भूल कर पहली बार मेनपुरी मीटिंग के दौरान मुलायम मायावती एक मंच पर आए और उसके बावजूद नतीजे क्या रहे वो जगजाहिर है 


2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. फिर आपसे बेहतर तो किसी ने नही देखा होगा की उस रोज क्या हुआ था

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