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छात्रसंघ चुनाव 2019

छात्रसंघ चुनाव:

छात्रो ने दोनों पार्टियो को नकारा



छात्रसंघ चुनाव 2019

पिछले दिनों राज्य के बड़े शहरो मे बड़े बड़े होर्डिंग लिए सरपट दौड़ती suv कारे ओपन जीप मे नारे लगाते युवा ओर शहर की सड़कों पर बिखरे पड़े पेम्पलेट शायद किसी बड़े चुनाव का हवाला दे रहे थे छात्रो के लिए अपना नेता चुनने का पर्व है महाविध्यालयों के चुनाव राजनीति की प्रथम सीढ़ी है छात्रसंघ चुनाव और साल भर कॉलेज मे मौज काटने वाले पिछली बेंच के होनहारों के लिए किसी दिवाली से कम नहीं होते छात्रसंघ चुनाव

छात्रसंघ चुनावो मे चंदा इक्कठा करना और उस चंदे से को चुनाव मे पानी की तरह बहाना आम बात है इस देश मे हालांकि कुछेक राज्यो मे अब छात्रसंघ चुनाव पर पूर्णतया रोक लग चुकी है क्योकि यूपी और बिहार जैसे राज्यो मे बात बात पर पिस्टल तानने का खेल छात्रसंघ चुनावो मे ही छात्र सीख लेते थे ऐसे मे वहाँ की सरकारो ने  मजबूरन चुनावो पर रोक लगा दी हालांकि रोक तो राजस्थान मे भी लगी थी लेकिन मात्र 6 साल के लिए 2005 से 2011 तक 2011 मे तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जो कभी खुद भी छात्रसंघ अध्यक्ष के तौर पर अपना राजनीतिक केरियर शुरू किए थे ने रोक हटा दुबारा चुनावो की अनुमति दी और छात्रो के मन मे जैसे लड्डू ही लड्डू फूटने लगे और अभागे निकले वे छात्र जिन्होने 2005 से 2010 के बीच अपना कॉलेज पूरा किया क्योकि वे इस आनंदित अनुभूति का हिस्सा भी न बन पाये हालांकि दिल्ली के छात्रसंघ चुनाव सबसे दिलचस्प होते है और देश भर की नजर रहती है फिर भी राजस्थान के 4 बड़े विश्वविध्यालयों मे होने वाले चुनाव पूरे राज्य मे हलचल पैदा करते है दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा व कांग्रेस इस चुनावो मे दिलचस्पी लेती है कारण की दोनों पार्टियो के छात्र समर्पित संघटन के तले छात्र चुनाव भी लड़ते है फिर वो चाहे कांग्रेस का  nsui संगठन हो या भाजपा का abvp संगठन

छात्रसंघ चुनाव 2019
पिछले दिनों राजस्थान मे सम्पन्न हुए छात्रसंघ चुनावो के अप्रत्याशित नतीजो ने दोनों राष्ट्रीय पार्टियो के होश फाकता कर दिये abvp ने तो फिर भी राज्य की 4 मे से दो बड़ी यूनिवर्सिटी पर जीत हालिस कर ली लेकिन कांग्रेस समर्थित nsui का सुफड़ा ही साफ हो गया राज्य की दो बड़ी यूनिवर्सिटी राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर और जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर मे निर्दलीय प्र्त्याशियों का जितना अचरज से कम नही था वहीं अजमेर की एमडीएस यूनिवर्सिटी और उदयपुर की मोहनलाल सुखड़िया यूनिवर्सिटी पर भाजपा समर्थित abvp के उम्मीदवार की जीत हुई
छात्र संघ चुनावो मे न तो मोदी राहुल गांधी के नारे थे न ही देशहित वाले भाषण न ही आर्टिकल 370 का कहीं जिक्र इससे इतर छात्रसंघ चुनाव जातीय आधार पर छात्र संख्याबल पर पैसे फेंकने की हेसियत पर लड़े जाते है दरअसल छात्र मे जातिवाद कूट कूट कर भरने की पहली सीढ़ी होते है छात्रसंघ चुनाव राज्य मे दोनों संघटन टिकट वितरण तक जाति देख कर तय करते है ऐसे परिपेक्ष्य मे आप उम्मीद नही कर सकते की आगे जाकर वो छात्र नेता अपना जातीय कार्ड नही खेलेगा अर्थात हर सिक्के के दो पहलू होते है अच्छा और बुरा ठीक इस तरह छात्रसंघ चुनाव भी छात्रो को राजनीति की पहली सीढ़ी तो चढ़वाते है लेकिन उसके नाम के आगे जातिगत छवि और दबंगाई वाला टेग भी लगवा देते है इस बार के सम्पन्न हुए चुनाव मे जोधपुर का चुनाव सबसे दिलचस्प और राज्य मे चर्चित रहा क्योकि जयपुर मे पिछले काफी समय से एक ही जाति के 3 से चार उम्मीदवार लड़ने पर वैसे ही निर्दलीय की जीतने की उम्मीद बढ़ जाती है और अब जयपुर मे तो ये आम हो गया है लेकिन जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविध्यालय के इतिहास मे ऐसा पहली बार हुआ की कोई निर्दलीय प्रत्याशी जीता हो और भारी मतो से जीता तो लगभग 12000 वोट समेटे jnvu मारवाड़ क्षेत्र की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है और यहाँ टिकट वितरण भी जाती देख कर ही होता आया है nsui जहां जाट प्रत्याशी उतारता है तो abvp राजपूत समाज को टिकट देता आया है लेकिन इस चुनाव मे दिलचस्प मोड तब आया जब लगातार 2 साल से abvp से टिकट की मांग कर रहे छात्र रविन्द्र सिंह भाटी को इस बार भी टिकट नही मिला abvp ने इस बार इंजीनियरिंग के छात्र त्रिवेन्द्र पाल सिंह पर दांव खेला लगातार तीसरी बार भी टिकट नही मिलने से नाराज रविन्द्र भाटी ने निर्दलीय ताल ठोकी शुरुवात मे प्रथम द्र्श्थ्या पूरे संभाग को नजर आ रहा था की दो राजपूतो की लड़ाई मे nsui का जाट प्रत्याशी आराम से चुनाव जीत जाएगा लेकिन फिर शुरू हुआ भाटी का सोशल इंजीनियरिंग का खेल जिसको nsui और abvp दोनों प्रत्याशी समझ नही पाये और जब समझ पाते तब तक देर हो चुकी थी रवीन्द्र भाटी ने गाँव गाँव ढानी ढानी के छात्र से सीधे संपर्क किया शहर मे रहने वाले हर स्टूडेंट के घर जाकर मुलाक़ात की और छात्रो को विश्वास दिलाया की आपको कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नही चुनना है जो आप किसी संगठन के पिछल्गु बन कर उन्हे ही वोट देते रहो आपको अपने यूनिवर्सिटी के लिए एक बेहतर अध्यक्ष चुनना है जो सदेव आपके साथ आपके पास खड़ा मिले रविन्द्र भाटी का मेनेजमेंट इतना तगड़ा था की nsui के परमानेंट वोट कहे जाने वाले न्यू केम्पस और साइंस फेकल्टी तक ने निर्दलीय भाटी पर विश्वास जताया रही बात abvp के कोर वोटर्स की तो उन्होने भी नए प्रत्याशी त्रिवेन्द्र की जगह 3 साल से abvp के लिए काम कर चुके निर्दलीय भाटी पर विश्वास जताया और नतीजा ये रहा की 2 साल पहले लगातार 3 जीत हासिल करने वाली abvp इस द्फ़े तीसरे स्थान पर रही जबकि nsui भी काफी पिछड़ गयी अंतिम घोषणा के वक्त रविन्द्र 1294 मतो से विजयी हुए जो राजस्थान के किसी भी यूनिवर्सिटी मे किसी भी निर्दलीय की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी   

टिप्पणियां

  1. बहुत शानदार लेख

    लेकिन आपने लिखा छात्र संख्याबल पर पैसे फैंकने की हैसियत.....
    पैसे छात्रों पर नही फैंके जाते
    दूसरा jnvu में 12000 वोटर नही 21 22 हजार के आसपास वोटर हैं

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